भोपाल। राजधानी भोपाल का टिंबर मार्केट आज शहर के बीचों-बीच एक बड़े खतरे के रूप में खड़ा है। हजारों टन लकड़ियों के बीच थिनर और केमिकल का खुलेआम भंडारण किसी ‘बारूद के ढेर’ से कम नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार थिनर और कई केमिकल अत्यंत ज्वलनशील होते हैं, जिन पर पानी डालने के बाद भी आग बुझाना मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि बीते 48 दिनों में टिंबर मार्केट में दो बड़ी आगजनी की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें करोड़ों की लकड़ी और मशीनें जलकर खाक हो गईं। इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों ने कोई ठोस सबक नहीं लिया।

शनिवार तड़के एक बार फिर टिंबर मार्केट में भीषण आग लग गई। आग लगते ही अफरा-तफरी मच गई और दमकलों को घंटों मशक्कत करनी पड़ी। इसके बाद एक बार फिर जिम्मेदारों ने टिंबर मार्केट को जल्द शिफ्ट करने की बात दोहराई, लेकिन सवाल यह है कि जब पिछले कई वर्षों से हादसे हो रहे हैं, तो अब तक ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हो पाई।
थिनर और केमिकल बने आग के सबसे बड़े कारण
जांच में सामने आया है कि आरा मशीनों में बड़ी मात्रा में थिनर और केमिकल रखे जाते हैं। थिनर का उपयोग पेंट में किया जाता है, जबकि लकड़ियों को कीटों से बचाने के लिए उन पर विशेष केमिकल लगाए जाते हैं। जब आग लगती है, तो यही ज्वलनशील पदार्थ आग को और विकराल बना देते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी स्थिति में आग पर काबू पाना बेहद कठिन हो जाता है और छोटा हादसा भी बड़े त्रासदी में बदल सकता है।

2160 टन लकड़ी के बीच मंडरा रहा खतरा
टिंबर मार्केट में कुल 108 आरा मशीनें संचालित हैं। यदि एक आरा मशीन में औसतन 20 टन लकड़ी भी मानी जाए, तो कुल मिलाकर यहां करीब 2160 टन यानी 2 लाख 16 हजार क्विंटल लकड़ी मौजूद है। गनीमत रही कि हालिया आगजनी अलग-अलग समय पर हुई, जिससे आग ज्यादा नहीं फैली, अन्यथा एक साथ आग भड़कने की स्थिति में भारी जनहानि हो सकती थी। टिंबर मार्केट के आसपास घनी आबादी, दुकानें, पेट्रोल पंप और रेलवे ट्रैक मौजूद हैं, जिससे खतरा और भी बढ़ जाता है।
48 दिन में साढ़े 3 करोड़ का नुकसान
शनिवार सुबह भोपाल डेकोरेटर शोरूम और एक आरा मशीन में आग लगने से करीब 1 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। इससे पहले 9 नवंबर को भी इसी इलाके में आग लगी थी, जिसमें लगभग उतना ही नुकसान हुआ था। इस तरह 48 दिनों में करीब साढ़े 3 करोड़ रुपए की लकड़ी और मशीनें जल चुकी हैं। आग के दौरान रेलवे ट्रैक से गुजरने वाली ट्रेनों को भी एहतियातन धीमी गति से निकाला गया।

आग बुझाने में कर्मचारी घायल
आग बुझाने के दौरान नगर निगम के 2 कर्मचारियों सहित कुल 4 लोग घायल हो गए। यह घटना दर्शाती है कि न केवल व्यापारी बल्कि राहत कार्य में लगे कर्मचारी भी लगातार खतरे में काम कर रहे हैं।
कलेक्टर का दावा – ढाई महीने में शिफ्टिंग
टिंबर मार्केट में आगजनी और आरा मशीनों की शिफ्टिंग को लेकर कलेक्टर कौशलेंद्र विक्रम सिंह ने कहा कि शिफ्टिंग की प्रक्रिया चल रही है और अगले दो से ढाई महीने में आरा मशीनें शिफ्ट कर दी जाएंगी। इसे लेकर जल्द ही समीक्षा बैठक भी की जाएगी। हालांकि, यह दावा पहले भी कई बार किया जा चुका है, लेकिन जमीनी हकीकत अब तक नहीं बदली।

मेट्रो प्रोजेक्ट भी अटका
टिंबर मार्केट की वजह से भोपाल मेट्रो का अहम हिस्सा भी प्रभावित हो रहा है। भोपाल में मेट्रो की ऑरेंज लाइन (एम्स से करोंद, 14.99 किमी) पर काम चल रहा है। एम्स से सुभाषनगर तक का प्रायोरिटी कॉरिडोर पूरा हो चुका है और कमर्शियल रन भी शुरू हो गया है, लेकिन सुभाषनगर से करोंद तक का दूसरा फेज आरा मशीनों की वजह से अटका हुआ है। मेट्रो के अंडरग्राउंड रूट के लिए कुल 108 में से 46 आरा मशीनों का शिफ्ट होना जरूरी है, लेकिन अब तक यह संभव नहीं हो पाया।
48 साल पुराना है टिंबर मार्केट
भोपाल का यह टिंबर मार्केट करीब 48 साल पुराना है। समय के साथ इसके चारों ओर रहवासी इलाके बस गए। आगजनी की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए मेट्रो प्रोजेक्ट के बहाने इसे शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर परवलिया के छोटा रातीबड़ में शिफ्ट करने की योजना बनाई गई। इसके लिए 18 एकड़ जमीन आवंटित की गई और करीब 5.85 करोड़ रुपए बुनियादी सुविधाओं के लिए दिए जा चुके हैं, लेकिन काम की रफ्तार बेहद धीमी है।
18 साल से चल रही कवायद
आरा मशीनों की शिफ्टिंग का मुद्दा पहली बार साल 2007 में उठा था। तब से अब तक करीब 50 से ज्यादा बैठकें हो चुकी हैं और 8 अलग-अलग लोकेशन देखी गईं, लेकिन बात नहीं बन सकी। करीब दो साल पहले पहली बार संचालकों को नोटिस देकर छोटा रातीबड़ में शिफ्ट होने का विकल्प दिया गया। संचालकों ने लिखित सहमति भी दी, जमीन जिला उद्योग केंद्र को सौंपी गई और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विभाग ने टेंडर भी निकाले, लेकिन काम आज भी अधूरा है।
बड़ा खतरा अब भी बरकरार
जब तक टिंबर मार्केट पूरी तरह शिफ्ट नहीं होता, तब तक भोपाल शहर के बीचों-बीच यह बड़ा खतरा बना रहेगा। आगजनी में दुकानदारों को हर बार लाखों रुपए का नुकसान उठाना पड़ता है और शहर की सुरक्षा भी दांव पर लगी रहती है। सवाल यह है कि क्या प्रशासन अगली बड़ी घटना का इंतजार कर रहा है, या फिर इस बार वाकई टिंबर मार्केट को शहर से बाहर शिफ्ट कर एक स्थायी समाधान निकाला जाएगा।