सागर।
शिक्षा, संस्कृति और आत्मविकास के महत्वपूर्ण संबंधों को रेखांकित करते हुए Dr. Harisingh Gour Central University के फार्मेसी विभाग में भारतीय शिक्षण मंडल का 57वां स्थापना दिवस उत्साहपूर्वक मनाया गया। इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में मातृभाषा, स्वभाषा और आत्मबोध के महत्व पर गहन चर्चा हुई, जिसमें शिक्षकों, विद्यार्थियों और शिक्षण मंडल के पदाधिकारियों ने भाग लिया।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि मातृभाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और मूल्यों की आधारशिला होती है। मुख्य अतिथियों ने कहा कि किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास और बौद्धिक उन्नति में उसकी भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। मातृभाषा के माध्यम से ही व्यक्ति अपने विचारों को सहज रूप से व्यक्त कर पाता है और समाज से गहराई से जुड़ता है।
संयुक्त कुलसचिव संतोष सोहगौरा ने अपने उद्बोधन में “स्वबोध” की अवधारणा को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि स्वबोध का अर्थ केवल स्वयं को जानना नहीं, बल्कि अपनी भावनाओं, विचारों और व्यवहार को समझना भी है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति को क्रोध आता है, तो उसे केवल प्रतिक्रिया देने के बजाय यह समझना चाहिए कि क्रोध का कारण क्या है और उसे कैसे नियंत्रित किया जा सकता है। इस प्रकार की आत्मचेतना व्यक्ति को संतुलित और परिपक्व बनाती है।
उन्होंने यह भी बताया कि आत्मबोध और राष्ट्रनिर्माण एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। जब व्यक्ति अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को समझता है, तब वह एक जागरूक नागरिक बनता है, और ऐसे नागरिक मिलकर एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण करते हैं। उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि व्यक्ति को आत्मनिर्भर और जागरूक बनाना भी है।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और भारतीय शिक्षण मंडल के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख संजय पाठक ने स्वभाषा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दुनिया के विकसित देश अपनी भाषा में शिक्षा और अनुसंधान को बढ़ावा देते हैं। उन्होंने कहा कि स्वभाषा वह भाषा होती है, जिसमें व्यक्ति सहज रूप से सोचता है और अपने विचारों को स्पष्ट रूप से व्यक्त कर पाता है।

संजय पाठक ने यह भी कहा कि भाषा केवल संप्रेषण का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति और परंपराओं की वाहक होती है। उन्होंने विदेशी भाषाओं को अत्यधिक प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए कहा कि इससे लोग अपनी जड़ों से दूर हो सकते हैं। उनके अनुसार, यदि शिक्षा स्वभाषा में दी जाए तो विद्यार्थियों के लिए विषयों को समझना अधिक आसान हो जाता है और उनकी सोच अधिक स्पष्ट और सशक्त बनती है।
कार्यक्रम में कुलगुरु यशवंत सिंह ठाकुर ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि मातृभाषा और आत्मबोध भारतीय संस्कृति के मूल तत्व हैं। उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ा रहता है, तो उसका व्यक्तित्व स्वतः ही सशक्त और संतुलित बनता है। उन्होंने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि वे अपनी मातृभाषा पर गर्व करें और उसके माध्यम से ज्ञान अर्जित करने का प्रयास करें।
कार्यक्रम में यह भी बताया गया कि आत्मबोध के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन में अनुशासन और जिम्मेदारी की भावना विकसित करता है। यह गुण न केवल व्यक्तिगत जीवन में सफलता दिलाते हैं, बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास में भी योगदान देते हैं।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के शिक्षक, शोधार्थी और बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे। सभी ने इस कार्यक्रम को ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायक बताया।
समापन में यह संदेश दिया गया कि यदि शिक्षा को प्रभावी और सार्थक बनाना है, तो मातृभाषा को उसका केंद्र बनाना होगा। साथ ही, आत्मबोध के माध्यम से व्यक्तित्व विकास को प्राथमिकता देना आवश्यक है, तभी एक सशक्त समाज और राष्ट्र का निर्माण संभव हो सकेगा।