संस्कारयुक्त शिक्षा पर जोर: भारतीय शिक्षण मंडल की संगोष्ठी में ‘गुरु के महत्व’ पर हुई गहन चर्चा !

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सागर।
भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कारयुक्त शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भारतीय शिक्षण मंडल महाकौशल प्रांत द्वारा 57वें स्थापना दिवस के अवसर पर सागर जिले के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, बम्होरी बीका में एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी का विषय था— “भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरु का महत्व”, जिसमें शिक्षकों, विद्यार्थियों और शिक्षण मंडल के सदस्यों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य वर्तमान शिक्षा प्रणाली में भारतीय संस्कारों और नैतिक मूल्यों को पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता पर बल देना था। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ विद्यार्थियों को सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों से जोड़ना भी अत्यंत आवश्यक है, जिससे उनका समग्र विकास सुनिश्चित हो सके।

संगोष्ठी की मुख्य वक्ता अर्चना पाराशर ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय शिक्षण मंडल का मूल उद्देश्य शिक्षा को भारतीयता से जोड़ना है। उन्होंने बताया कि भारतीय परंपरा में गुरु को अत्यंत उच्च स्थान प्राप्त है, क्योंकि गुरु ही वह व्यक्ति होता है जो शिष्य को अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाता है। उन्होंने कहा कि आज के समय में भी गुरु की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी प्राचीन काल में थी।

डॉ. वर्षा तिवारी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि किसी भी विद्यार्थी का सर्वांगीण विकास गुरु के मार्गदर्शन में ही संभव है। उन्होंने महापुरुषों के जीवन का उदाहरण देते हुए बताया कि हर सफल व्यक्ति के पीछे एक प्रेरणादायक गुरु का योगदान होता है। गुरु केवल ज्ञान ही नहीं देता, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाता है।

डॉ. कृष्णा गुप्ता ने शिक्षा के सिद्धांतों और शिक्षक-शिष्य संबंधों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसमें नैतिकता, अनुशासन और मूल्यों का समावेश होना चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षक और शिष्य के बीच सामंजस्य और विश्वास का होना आवश्यक है, तभी शिक्षा प्रभावी बनती है।

विद्यालय की प्राचार्य सविता मिश्रा ने अपने संबोधन में वर्तमान समय में नैतिक शिक्षा की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में बच्चों को केवल अकादमिक ज्ञान देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें अच्छे संस्कार और नैतिक मूल्य भी सिखाना जरूरी है। इससे वे न केवल अच्छे विद्यार्थी बनेंगे, बल्कि जिम्मेदार नागरिक भी बन सकेंगे।

संगोष्ठी के दौरान वक्ताओं ने यह भी बताया कि भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति का चरित्र निर्माण करना भी होता है। गुरु-शिष्य परंपरा इस दिशा में एक महत्वपूर्ण माध्यम रही है, जिसने समाज को दिशा देने का कार्य किया है।

कार्यक्रम में उपस्थित विद्यार्थियों ने भी इस विषय को लेकर गहरी रुचि दिखाई और वक्ताओं के विचारों से प्रेरणा ली। शिक्षकों ने विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति और परंपराओं के प्रति जागरूक रहने का संदेश दिया।

समापन में यह निष्कर्ष निकाला गया कि यदि शिक्षा में संस्कार और नैतिकता को शामिल किया जाए, तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है। भारतीय शिक्षण मंडल की यह पहल शिक्षा के क्षेत्र में एक सार्थक प्रयास मानी जा रही है, जो आने वाली पीढ़ियों को सही दिशा देने में सहायक होगी।

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