रिफाइनरी के 5 किमी नो-डेवलपमेंट जोन के खिलाफ ग्रामीणों का मोर्चा, किसानों ने भी उठाए बकाया भुगतान और ई-टोकन के मुद्दे !

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बीना। भारत पेट्रोलियम की बीना रिफाइनरी के आसपास लागू 5 किलोमीटर के नो-डेवलपमेंट जोन को लेकर ग्रामीणों और किसानों का विरोध अब खुलकर सामने आने लगा है। बुधवार को बीना दौरे पर पहुंचीं कलेक्टर प्रतिभा पाल को ग्रामीणों और किसान संगठनों ने अलग-अलग ज्ञापन सौंपकर अपनी समस्याओं से अवगत कराया। ग्रामीणों ने जहां नो-डेवलपमेंट जोन समाप्त करने की मांग की, वहीं किसान संगठनों ने किसानों के बकाया भुगतान, ई-टोकन व्यवस्था की खामियों और कृषि उपज मंडी में अव्यवस्थाओं का मुद्दा प्रमुखता से उठाया।

ग्रामीणों का कहना है कि रिफाइनरी के आसपास स्थित कई गांव इस प्रतिबंधित क्षेत्र की सीमा में आते हैं। इसके कारण आम लोगों को अपने मकान बनाने, भवनों का विस्तार करने तथा अन्य विकास कार्य कराने में गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। उनका आरोप है कि यह व्यवस्था क्षेत्र के विकास में सबसे बड़ी बाधा बन चुकी है।

ज्ञापन में ग्रामीणों ने बताया कि वर्षों से गांवों में रहने वाले लोगों को अब छोटे-छोटे निर्माण कार्यों के लिए भी अनुमति की जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। कई मामलों में अनुमति नहीं मिलने के कारण लोगों को अपने ही निजी भूखंडों पर निर्माण कार्य रोकने पड़ रहे हैं। इससे न केवल आर्थिक नुकसान हो रहा है बल्कि लोगों की बुनियादी आवश्यकताएं भी प्रभावित हो रही हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि रिफाइनरी के संचालन के बाद सुरक्षा कारणों का हवाला देकर 5 किलोमीटर के दायरे में नो-डेवलपमेंट जोन लागू किया गया था, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में इसकी समीक्षा की जानी चाहिए। उनका तर्क है कि रिफाइनरी के अनेक अधिकारी, कर्मचारी और अन्य लोग भी आसपास के क्षेत्रों में निवास करते हैं, फिर भी प्रतिबंधों का सबसे अधिक प्रभाव स्थानीय ग्रामीणों और किसानों पर पड़ रहा है।

ज्ञापन में यह भी कहा गया कि नो-डेवलपमेंट जोन के कारण गांवों में विकास योजनाओं की गति प्रभावित हुई है। कई लोग अपने बच्चों के लिए नया मकान बनाना चाहते हैं, लेकिन प्रशासनिक बाधाओं के कारण ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। इससे ग्रामीणों में असंतोष बढ़ रहा है।

ग्रामीणों ने कलेक्टर से मांग की कि बीना रिफाइनरी के आसपास लागू 5 किलोमीटर के नो-डेवलपमेंट जोन को समाप्त किया जाए अथवा इसके नियमों में संशोधन कर आम नागरिकों को राहत प्रदान की जाए। ज्ञापन सौंपने वालों में सौरभ आचवल, लोकेंद्र सिंह देहरी, अवधेश तिवारी और रौनक हुरकट सहित अनेक ग्रामीण शामिल रहे।

इधर, रेस्ट हाउस में आयोजित बैठक के दौरान किसान संगठनों ने भी किसानों की समस्याओं को जोरदार ढंग से उठाया। किसान मोर्चा के संभागीय अध्यक्ष सीताराम ठाकुर और प्रतिपाल सिंह ने बताया कि बीना क्षेत्र में लगभग 30 हजार खसरों का फार्मर आईडी से लिंकिंग कार्य अभी तक पूरा नहीं हो सका है। इसके कारण बड़ी संख्या में किसानों को खाद वितरण की ई-टोकन प्रणाली का लाभ लेने में परेशानी हो रही है।

किसान नेताओं ने बताया कि वर्तमान व्यवस्था के तहत फार्मर आईडी लिंक नहीं होने पर किसानों को खाद प्राप्त करने में तकनीकी अड़चनों का सामना करना पड़ता है। कई किसानों को बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, जिससे खेती-किसानी का काम प्रभावित हो रहा है।

बैठक में किसानों ने समर्थन मूल्य पर अपनी उपज बेचने वाले किसानों के लंबित भुगतान का मुद्दा भी उठाया। किसान संगठनों का दावा है कि क्षेत्र के किसानों का लगभग 48 करोड़ रुपये का भुगतान अभी तक लंबित है। उन्होंने प्रशासन से शीघ्र भुगतान सुनिश्चित करने की मांग की ताकि किसानों को आर्थिक राहत मिल सके।

किसान नेताओं ने कृषि उपज मंडी की व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठाए। उनका आरोप है कि कुछ व्यापारियों द्वारा मंडी परिसर में अतिक्रमण किया गया है, जिससे किसानों और व्यापारियों दोनों को असुविधा हो रही है। उन्होंने मांग की कि मंडी परिसर में हुए अतिक्रमण की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।

किसानों ने कहा कि मंडी परिसर किसानों के हितों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है। यदि वहां अवैध कब्जे और अतिक्रमण जारी रहते हैं तो इसका सीधा असर कृषि विपणन व्यवस्था पर पड़ेगा। इसलिए प्रशासन को इस दिशा में तत्काल कदम उठाने चाहिए।

कलेक्टर प्रतिभा पाल ने ग्रामीणों और किसान प्रतिनिधियों की बात ध्यानपूर्वक सुनी तथा संबंधित अधिकारियों को मामलों का परीक्षण कर आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार किसानों और ग्रामीणों द्वारा उठाए गए मुद्दों पर विभागीय स्तर पर समीक्षा की जाएगी।

बीना क्षेत्र में रिफाइनरी के विस्तार, औद्योगिक विकास और कृषि गतिविधियों के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती लगातार सामने आ रही है। एक ओर औद्योगिक निवेश और विकास की योजनाएं हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय ग्रामीणों और किसानों की समस्याएं भी हैं। ऐसे में प्रशासन के सामने विकास और जनहित के बीच संतुलित समाधान तलाशने की जिम्मेदारी बढ़ गई है।

ग्रामीणों और किसान संगठनों का कहना है कि यदि उनकी समस्याओं का समय रहते समाधान नहीं हुआ तो वे व्यापक जनआंदोलन की दिशा में भी विचार कर सकते हैं। फिलहाल सभी की नजर प्रशासन द्वारा उठाए जाने वाले आगामी कदमों पर टिकी हुई है।

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