दमोह। मध्यप्रदेश के सरकारी संजीवनी क्लिनिकों में फर्जी डॉक्टरों की नियुक्ति का बड़ा मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है। दमोह और जबलपुर में पकड़े गए तीन आरोपियों ने फर्जी एमबीबीएस डिग्री और दूसरे डॉक्टरों के मेडिकल काउंसिल रजिस्ट्रेशन नंबर के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल कर ली थी। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ये आरोपी करीब डेढ़ साल तक सरकारी क्लिनिकों में मरीजों का इलाज करते रहे, लेकिन उनके दस्तावेजों का सत्यापन तक नहीं किया गया।
मामले का खुलासा रविवार को हुआ, जब पुलिस ने दमोह और जबलपुर से तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया। आरोपियों की पहचान राजपाल गौर, कुमार सचिन यादव और अजय मौर्य के रूप में हुई है। पुलिस ने तीनों को गिरफ्तार कर 20 मई तक रिमांड पर लिया है और उनसे पूछताछ जारी है।

दूसरे डॉक्टरों के नंबर का इस्तेमाल
जांच में सामने आया कि दमोह के संजीवनी क्लिनिक में पदस्थ राजपाल गौर और कुमार सचिन यादव द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे मेडिकल काउंसिल पंजीयन नंबर फर्जी थे। इनमें से एक नंबर नर्मदापुरम में पदस्थ एक वास्तविक डॉक्टर का निकला। पुलिस ने जब दोनों आरोपियों से पूछताछ की, तो उनकी निशानदेही पर जबलपुर के संजीवनी क्लिनिक में कार्यरत अजय मौर्य की डिग्री भी संदिग्ध पाई गई।
प्रारंभिक जांच में खुलासा हुआ है कि आरोपियों ने फर्जी दस्तावेज तैयार कर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में नौकरी हासिल की थी। पुलिस को उनके पास से विभिन्न विश्वविद्यालयों और मेडिकल संस्थानों के दस्तावेज भी मिले हैं, जिनमें कई दस्तावेज नकली पाए गए हैं।
रीवा मेडिकल कॉलेज और जीवाजी विश्वविद्यालय के नाम का इस्तेमाल
पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि फर्जी डिग्री तैयार करने के लिए रीवा मेडिकल कॉलेज और जीवाजी विश्वविद्यालय के नाम का इस्तेमाल किया गया। आरोपियों के पास से बरामद दस्तावेजों में कई प्रमाणपत्र संदिग्ध पाए गए हैं। अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि फर्जी डिग्रियां तैयार करने वाला नेटवर्क कहां संचालित हो रहा था और इसमें कौन-कौन लोग शामिल हैं।
डेढ़ साल तक बिना सत्यापन नौकरी
सबसे गंभीर सवाल यह उठ रहा है कि आखिर बिना दस्तावेज सत्यापन के इन लोगों की नियुक्ति कैसे हो गई। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) की नियुक्ति प्रक्रिया में स्पष्ट उल्लेख था कि आवेदकों को राज्य चिकित्सा परिषद का जीवित पंजीयन, बंधपत्र और एनओसी प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा। साथ ही सभी दस्तावेजों का सत्यापन भी कराया जाना था।
इसके बावजूद संबंधित अधिकारियों ने दस्तावेजों की जांच नहीं कराई। इतना ही नहीं, मार्च 2026 में संविदा अवधि समाप्त होने के बाद भी इनकी नियुक्ति बढ़ा दी गई। अब मामला उजागर होने के बाद स्वास्थ्य विभाग और एनएचएम के अधिकारी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं।
दमोह सीएमएचओ डॉ. राजेश अठ्या का कहना है कि दस्तावेजों का अंतिम सत्यापन भोपाल स्तर से होना था। वहीं एनएचएम अधिकारियों का दावा है कि जांच जिला स्तर पर की जानी थी।
प्रदेशभर में फैले बड़े रैकेट की आशंका
पुलिस और स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों के अनुसार यह मामला केवल तीन फर्जी डॉक्टरों तक सीमित नहीं है। प्रारंभिक जांच में संकेत मिले हैं कि प्रदेशभर में 50 से 70 से अधिक फर्जी डॉक्टर सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में पदस्थ हो सकते हैं। मुरैना जिले में भी ऐसे पांच संदिग्ध डॉक्टरों की जानकारी सामने आई है।
जांच एजेंसियों को आशंका है कि यह एक संगठित रैकेट है, जो फर्जी डिग्रियां और मेडिकल पंजीयन तैयार कर लोगों को सरकारी नौकरी दिलाने का काम कर रहा था। पुलिस अब इस पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़ने में लगी है।
दमोह से भोपाल तक जांच
दमोह एसपी आनंद कलादगी ने बताया कि यह बेहद गंभीर और बड़ा मामला है। जांच दमोह से लेकर भोपाल तक की जा रही है। आरोपियों से पूछताछ में कई अहम सुराग मिले हैं और अन्य संदिग्धों की तलाश के लिए पुलिस टीमें विभिन्न स्थानों पर भेजी गई हैं।
उन्होंने कहा कि पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि फर्जी दस्तावेज तैयार करने में किन लोगों की भूमिका रही और नियुक्ति प्रक्रिया में किन अधिकारियों की लापरवाही या मिलीभगत रही।
मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़
इस पूरे मामले ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। डेढ़ साल तक फर्जी डॉक्टरों द्वारा मरीजों का इलाज किए जाने से लोगों में चिंता और आक्रोश है। विशेषज्ञों का कहना है कि बिना योग्य डिग्री वाले लोगों द्वारा इलाज किया जाना मरीजों की जिंदगी के साथ बड़ा खिलवाड़ है।
अब स्वास्थ्य विभाग पर यह दबाव बढ़ गया है कि प्रदेशभर के संजीवनी क्लिनिकों और अन्य स्वास्थ्य संस्थानों में पदस्थ डॉक्टरों के दस्तावेजों की दोबारा जांच कराई जाए, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके।