सहमति वाले लिव-इन में रेप केस खारिज |

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मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया है कि यदि दो वयस्क महिला और पुरुष अपनी सहमति से लिव-इन रिलेशन में रहते हैं और आपसी सहमति से संबंध बनाते हैं, तो बाद में विवाद होने पर दुष्कर्म (रेप) का आरोप लगाना उचित नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने कटनी के एक कपड़ा व्यापारी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करते हुए उन्हें बरी कर दिया।

यह मामला कटनी निवासी कपड़ा व्यापारी मुकेश ठाकुरानी से जुड़ा है। उनके खिलाफ एक महिला ने वर्ष 2020 में दुष्कर्म, धमकी और अन्य गंभीर धाराओं में मामला दर्ज कराया था। इस एफआईआर को चुनौती देते हुए व्यापारी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। लंबे समय तक चली सुनवाई के बाद कोर्ट ने 17 मार्च को अपना फैसला सुनाया।

मामले की शुरुआत वर्ष 2019 में हुई, जब मुकेश का अपनी पत्नी से विवाद हो गया। इसके बाद उनकी पत्नी बच्चों को लेकर मायके चली गई और उनके खिलाफ दहेज व भरण-पोषण का मामला दर्ज कराया। इसी दौरान कोर्ट में एक 24 वर्षीय युवती से उनकी मुलाकात हुई, जो स्वयं भी अपने वैवाहिक विवाद के कारण न्यायालय के चक्कर लगा रही थी।

दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई और धीरे-धीरे यह दोस्ती गहरी होती गई। युवती ने मुकेश को लिव-इन रिलेशन में रहने का सुझाव दिया और कहा कि भविष्य में दोनों अपने-अपने जीवनसाथियों से अलग होकर विवाह कर सकते हैं। इसके बाद दोनों साथ रहने लगे और लगभग डेढ़ साल तक उनके बीच संबंध रहे। इस दौरान वे कई स्थानों की यात्रा पर भी गए, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उनका संबंध आपसी सहमति पर आधारित था।

हालांकि समय के साथ दोनों के रिश्तों में तनाव बढ़ने लगा। घर में विवाद होने लगे और अंततः युवती ने मार्च 2020 में मुकेश का घर छोड़ दिया। इसके कुछ महीनों बाद, 25 जुलाई 2020 को उसने मुकेश के खिलाफ महिला थाने में दुष्कर्म, धमकी और अन्य धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कराई।

युवती ने आरोप लगाया कि मुकेश ने उसे शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाए और उसके आपत्तिजनक वीडियो बनाकर वायरल करने की धमकी दी। साथ ही उसने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी ने उसे और उसकी बच्ची को नुकसान पहुंचाने की धमकी दी।

एफआईआर दर्ज होने के अगले ही दिन पुलिस ने मुकेश को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें जेल भेज दिया गया। करीब 25 दिन जेल में रहने के बाद उन्हें हाईकोर्ट से जमानत मिल गई। इसके बाद उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज मामले को निराधार बताते हुए इसे रद्द करने की मांग की।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि दोनों पक्षों के बीच संबंध पूरी तरह सहमति से थे। युवती स्वयं विवाहित थी और यह जानती थी कि कानूनी रूप से तलाक लिए बिना दूसरा विवाह संभव नहीं है। ऐसे में विवाह का वादा अवास्तविक और असंभव था।

पुलिस जांच में भी कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए। आरोपी के मोबाइल से कोई आपत्तिजनक वीडियो नहीं मिला और न ही घर की तलाशी में कोई ऐसा हथियार मिला, जिसका उपयोग धमकी देने के लिए किया गया हो। साइबर सेल की जांच में भी ब्लैकमेलिंग के आरोपों की पुष्टि नहीं हुई।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि दो वयस्क व्यक्ति अपनी इच्छा से साथ रहते हैं और संबंध बनाते हैं, तो बाद में उत्पन्न हुए विवाद के आधार पर दुष्कर्म का मामला दर्ज करना न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने यह भी माना कि इस मामले में लगाए गए आरोप साक्ष्यों के आधार पर प्रमाणित नहीं हो पाए।

इस निर्णय के साथ कोर्ट ने न केवल आरोपी को राहत दी, बल्कि यह भी स्पष्ट संदेश दिया कि कानून का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। अदालत ने कहा कि सहमति से बने संबंधों को बाद में आपराधिक रूप देना न्याय की भावना के विपरीत है।

यह फैसला समाज और कानूनी व्यवस्था दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। इससे यह स्पष्ट होता है कि लिव-इन रिलेशनशिप में भी सहमति की भूमिका सबसे अहम होती है और किसी भी आरोप को साबित करने के लिए ठोस साक्ष्य आवश्यक हैं।

कुल मिलाकर, हाईकोर्ट का यह निर्णय एक मिसाल के रूप में देखा जा रहा है, जो यह बताता है कि न्यायालय तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर ही निर्णय लेते हैं, न कि केवल आरोपों के आधार पर।

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