भोपाल। भारतीय रेलवे द्वारा संचालित स्पेशल ट्रेनों के किराए को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। आरोप है कि रेलवे यात्रियों को कोई अतिरिक्त सुविधा दिए बिना केवल ट्रेन नंबर के आगे ‘0’ जोड़कर 20 से 25 प्रतिशत तक अधिक किराया वसूल रहा है। इस व्यवस्था के कारण लाखों यात्रियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है, जबकि रेलवे को करोड़ों रुपए की अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है।
जानकारी के अनुसार, गर्मी की छुट्टियों और त्योहारों के दौरान यात्रियों की बढ़ती भीड़ को देखते हुए रेलवे बड़ी संख्या में स्पेशल ट्रेनें संचालित करता है। इन ट्रेनों का उद्देश्य अतिरिक्त यात्रियों को सुविधा प्रदान करना बताया जाता है, लेकिन यात्रियों और रेल उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि अधिकांश स्पेशल ट्रेनों में सामान्य ट्रेनों जैसी ही सुविधाएं उपलब्ध होती हैं। इसके बावजूद किराया काफी अधिक लिया जाता है।
केवल नंबर बदला, किराया बढ़ गया
विश्लेषण में सामने आया है कि कई मामलों में सामान्य और स्पेशल ट्रेनों के बीच कोच संरचना, सीट क्षमता और यात्रा मार्ग लगभग समान होते हैं। अंतर केवल इतना होता है कि स्पेशल ट्रेन का नंबर अलग होता है और उसका किराया अधिक निर्धारित किया जाता है।

उदाहरण के तौर पर भोपाल से पुणे के बीच चलने वाली एक सामान्य सुपरफास्ट ट्रेन और एक स्पेशल ट्रेन की तुलना में पाया गया कि दोनों में एलएचबी कोच लगे हैं तथा यात्रियों को लगभग समान सुविधाएं मिलती हैं। इसके बावजूद स्पेशल ट्रेन के सेकेंड एसी का किराया सामान्य ट्रेन की तुलना में लगभग 375 रुपए अधिक है। इतना ही नहीं, स्पेशल ट्रेन यात्रा पूरी करने में सामान्य ट्रेन से अधिक समय भी लेती है।
हर ट्रिप में लाखों की अतिरिक्त कमाई
रेलवे सूत्रों और उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर अनुमान लगाया गया है कि एक स्पेशल ट्रेन के प्रत्येक ट्रिप से रेलवे को औसतन 1.25 लाख से 2 लाख रुपए तक अतिरिक्त आय प्राप्त हो सकती है। यदि सभी सीटें भर जाती हैं तो यह राशि और अधिक हो सकती है।
रेल मंत्रालय की ओर से जारी जानकारी के अनुसार 15 अप्रैल से 15 जुलाई 2026 के बीच देशभर में 908 समर स्पेशल ट्रेनों के कुल 18,262 ट्रिप संचालित किए जाने हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि प्रति ट्रिप औसतन 1.25 लाख रुपए अतिरिक्त आय मानी जाए तो तीन महीने की अवधि में रेलवे को लगभग 2,284 करोड़ रुपए से अधिक की अतिरिक्त कमाई हो सकती है।
यात्रियों पर बढ़ता आर्थिक बोझ
कमर्शियल गैस, खाद्य सामग्री और अन्य आवश्यक सेवाओं की बढ़ती कीमतों के बीच रेल यात्रा भी महंगी होती जा रही है। खासकर मध्यमवर्गीय और निम्न आय वर्ग के यात्रियों के लिए स्पेशल ट्रेनों का अधिक किराया चिंता का विषय बन गया है।

यात्रियों का कहना है कि कई बार सामान्य ट्रेनों में लंबी वेटिंग होने के कारण उन्हें मजबूरी में स्पेशल ट्रेन का टिकट लेना पड़ता है। ऐसे में वे अतिरिक्त राशि चुकाने को विवश हो जाते हैं। उनका तर्क है कि जब सुविधाएं समान हैं तो किराए में इतना बड़ा अंतर उचित नहीं माना जा सकता।
पारदर्शिता की मांग
रेल उपयोगकर्ता संगठनों का कहना है कि रेलवे को यह स्पष्ट करना चाहिए कि स्पेशल ट्रेनों में अतिरिक्त किराया किस आधार पर लिया जाता है। यदि वास्तव में कोई विशेष सुविधा, अतिरिक्त स्टाफ, बेहतर सेवा या अन्य खर्च शामिल हैं तो उसकी जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए।
पश्चिम मध्य रेल से जुड़े रेल उपभोक्ता प्रतिनिधियों का मानना है कि अतिरिक्त मांग को पूरा करने के लिए स्पेशल ट्रेनें चलाना आवश्यक है, लेकिन लंबे समय तक नियमित रूप से संचालित होने वाली ट्रेनों को केवल ‘स्पेशल’ श्रेणी में रखकर अधिक किराया वसूलना तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता।
रेलवे का पक्ष

रेलवे का तर्क है कि स्पेशल ट्रेनों के संचालन में अतिरिक्त संसाधन, अतिरिक्त रेक, रखरखाव, स्टाफ व्यवस्था और परिचालन लागत शामिल होती है। इसी कारण इन ट्रेनों के लिए विशेष किराया निर्धारित किया जाता है। हालांकि यात्रियों का कहना है कि यदि ऐसा है तो रेलवे को किराया निर्धारण की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी बनानी चाहिए।
क्या होना चाहिए समाधान?
विशेषज्ञों का मानना है कि रेलवे को स्पेशल ट्रेनों के किराए की समय-समय पर समीक्षा करनी चाहिए। यदि कोई ट्रेन लंबे समय से लगातार चल रही है और यात्रियों की स्थायी आवश्यकता बन चुकी है तो उसे नियमित ट्रेन के रूप में परिवर्तित करने पर विचार किया जा सकता है।
इसके अलावा किराया निर्धारण के मानदंड सार्वजनिक किए जाएं ताकि यात्रियों को यह समझने में आसानी हो कि उनसे अतिरिक्त राशि क्यों ली जा रही है।
भारतीय रेलवे देश की जीवनरेखा मानी जाती है और प्रतिदिन करोड़ों लोग इस पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में यात्री सुविधा, उचित किराया और पारदर्शिता तीनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। स्पेशल ट्रेनों के किराए को लेकर उठ रहे सवाल रेलवे के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत हैं कि वह अपनी नीतियों को अधिक स्पष्ट और यात्री हितैषी बनाए। इससे न केवल यात्रियों का भरोसा मजबूत होगा बल्कि रेलवे की कार्यप्रणाली भी अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बन सकेगी।