मप्र हाई कोर्ट ने जनहित याचिका को बताया ‘तमाशा !

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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने आदिवासी संगठन जयस के खरगोन जिला अध्यक्ष सचिन सिसोदिया द्वारा दायर जनहित याचिका को सख्त टिप्पणी के साथ खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि “क्या कोर्ट को तमाशा समझ रखा है?”—जब एक ही विषय पर बार-बार याचिकाएं लगाई जा रही हों। अदालत ने याचिका को जनहित नहीं, बल्कि निजी रंजिश और उद्देश्य से प्रेरित बताया।

जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस बिनोद कुमार द्विवेदी की डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता पर एक लाख रुपए की कॉस्ट लगाते हुए इसे एक महीने में हाई कोर्ट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी, इंदौर में जमा कराने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने क्यों कहा– याचिका का दुरुपयोग हुआ?

याचिका में 23 अगस्त की रात हुए आरआई सौरभ सिंह कुशवाह और कॉन्स्टेबल राहुल चौहान के विवाद को आधार बनाया गया था, जिसे जयस संगठन ने बड़े आंदोलन का रूप दे दिया था। शासन की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरल आनंद सोनी ने बताया कि—

  • समान विषय पर पहले भी याचिकाएँ दायर की गईं, जिन्हें याचिकाकर्ताओं ने वापस ले लिया।
  • फेसबुक पोस्टों और रिकॉर्ड के आधार पर यह याचिका व्यक्तिगत रंजिश का परिणाम प्रतीत होती है।
  • राहुल चौहान स्वयं सक्षम हैं और वे पहले दायर याचिका भी वापस ले चुके हैं।

इसके अलावा कोर्ट में वे सोशल मीडिया पोस्ट भी पेश की गईं, जिनमें प्रशासन व पुलिस के खिलाफ अराजक माहौल बनाने का प्रयास दिखा।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला

कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के

  • बलवंत सिंह चौफाल,
  • एस.पी. गुरु राजा,
  • देवेंद्र प्रकाश मिश्रा
  • और गुरपाल सिंह
    जैसे मामलों के फैसलों के सिद्धांतों का उल्लेख किया।

अदालत ने कहा—जनहित याचिका जनता की आवाज है, लेकिन इसका उपयोग प्रतिशोध, प्रचार या निजी लाभ के लिए नहीं किया जा सकता।

कोर्ट का स्पष्ट संदेश

  • जनहित तभी माना जाएगा, जब विषय में वास्तविक सार्वजनिक हित, तात्कालिकता और व्यापक प्रभाव हो।
  • व्यक्तिगत विवाद को जनहित का चोला पहनाकर कोर्ट का समय बर्बाद नहीं किया जा सकता।
  • दुरुपयोग पर सख्ती जरूरी है, इसलिए भारी कॉस्ट लगाई गई।

पृष्ठभूमि : विवाद से आंदोलन तक

खरगोन में आरआई और कॉन्स्टेबल के बीच हुए विवाद को लेकर जयस ने कई दिन धरना-प्रदर्शन किया, हाईवे जाम किया और एससी-एसटी एक्ट में कार्रवाई की मांग की। सोशल मीडिया पर भी उकसाने वाली पोस्टें वायरल हुईं।
मामला शांत न होने पर याचिकाएँ दायर हुईं, लेकिन पीड़ित पक्ष ने खुद ही वापस ले लिया। बाद में फिर नई याचिका लगाई गई, जिसे कोर्ट ने दुरुपयोग मानते हुए खारिज कर दिया।

अन्य संबंधित मामले भी चर्चित

इसी सुनवाई के साथ प्रदेश के दो और मामलों पर हाई कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णय सामने आए—

  • जबलपुर हाई कोर्ट ने कहा कि यदि जज स्वयं सुरक्षित नहीं, तो न्याय व्यवस्था कैसे सुरक्षित मानी जाएगी।
  • ग्वालियर हाई कोर्ट ने दुष्कर्म पीड़िता से अभद्रता के मामले में टीआई और डीएसपी के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए और निष्पक्ष जांच का आदेश दिया।

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