अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को उस समय असहज स्थिति का सामना करना पड़ा, जब स्विट्जरलैंड के दावोस के लिए रवाना हुआ उनका विशेष विमान एयर फोर्स वन टेकऑफ के कुछ देर बाद ही वॉशिंगटन लौट आया। व्हाइट हाउस ने बताया कि उड़ान के दौरान विमान में मामूली तकनीकी खराबी पाई गई थी, जिसके बाद सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए विमान को वापस लाने का फैसला किया गया।
व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलीन लीविट के मुताबिक, टेकऑफ के तुरंत बाद क्रू मेंबर्स को विमान में एक इलेक्ट्रिकल फॉल्ट का पता चला। हालांकि यह खराबी गंभीर नहीं थी, लेकिन राष्ट्रपति की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होने के कारण एहतियातन विमान को वापस वॉशिंगटन लाया गया।
राहत की बात यह रही कि कुछ देर बाद राष्ट्रपति ट्रम्प दूसरे विमान से दावोस के लिए रवाना हो गए, जहां वे वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) 2026 में हिस्सा लेंगे।

चार दशक पुराने विमानों पर निर्भर अमेरिकी राष्ट्रपति
फिलहाल अमेरिकी राष्ट्रपति की आधिकारिक यात्राओं के लिए बोइंग 747-200B विमान को एयर फोर्स वन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। इस बेड़े में ऐसे दो विमान शामिल हैं, जिनकी उम्र करीब 40 साल है।
हालांकि बोइंग कंपनी इन विमानों के नए विकल्प तैयार कर रही है, लेकिन यह प्रोजेक्ट लंबे समय से देरी का शिकार है। इसी बीच पिछले साल कतर के शाही परिवार ने ट्रम्प को एक अत्याधुनिक बोइंग 747-8 लग्जरी जंबो जेट भेंट किया था, जिसे भविष्य में एयर फोर्स वन फ्लीट में शामिल किया जाना है। इस फैसले पर अमेरिकी राजनीति में काफी सवाल भी उठे थे। फिलहाल उस विमान को अमेरिकी सुरक्षा मानकों के अनुरूप तैयार किया जा रहा है।
ग्रीनलैंड एजेंडे के साथ दावोस पहुंचे ट्रम्प
राष्ट्रपति ट्रम्प का दावोस दौरा इस बार बेहद अहम माना जा रहा है। वे बुधवार शाम करीब 7 बजे वैश्विक नेताओं को संबोधित करेंगे, जहां उनके भाषण का मुख्य फोकस ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की रणनीति, व्यापार नीति और वैश्विक सुरक्षा होगी।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रम्प का यह संबोधन ऐसे समय हो रहा है, जब दुनिया राजनीतिक तनाव, व्यापार युद्ध और सुरक्षा संकटों से गुजर रही है। यही वजह है कि दावोस में ट्रम्प की मौजूदगी और उनके हर बयान पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है।

WEF 2026: ट्रम्प की छह साल बाद वापसी
डोनाल्ड ट्रम्प करीब छह साल बाद दावोस लौटे हैं। इससे पहले उन्होंने 21 जनवरी 2020 को अपने पहले कार्यकाल के दौरान WEF को संबोधित किया था। इस बार उनका दौरा और ज्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि अमेरिका की विदेश और व्यापार नीति में आक्रामक बदलाव साफ दिखाई दे रहे हैं।
ट्रम्प के सलाहकारों के मुताबिक, वे दावोस में यह संदेश देंगे कि अमेरिका अब पुराने वैश्विक नियमों और सिस्टम से आगे बढ़ चुका है और व्यापार को कूटनीति व दबाव का एक मजबूत हथियार बनाया जाएगा।
ग्रीनलैंड पर सख्त रुख, यूरोप को टैरिफ चेतावनी
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रम्प का रुख लगातार आक्रामक होता जा रहा है। वे इसे अमेरिका की रणनीतिक और सैन्य सुरक्षा से जोड़कर देख रहे हैं। ट्रम्प का मानना है कि आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियों, खनिज संसाधनों और भू-राजनीतिक अहमियत के चलते ग्रीनलैंड पर अमेरिकी प्रभाव जरूरी है।
हाल ही में ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर एक विवादित मैप भी साझा किया था, जिसमें ग्रीनलैंड, कनाडा और वेनेजुएला को अमेरिका का हिस्सा दिखाया गया था।
इसके साथ ही अमेरिका ने डेनमार्क, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी समेत आठ यूरोपीय देशों पर 10% टैरिफ लगाया है। अमेरिकी प्रशासन ने संकेत दिए हैं कि विरोध बढ़ने पर यह टैरिफ 25% तक बढ़ाया जा सकता है।
NATO, चीन और रूस पर भी सख्त संदेश संभव
ट्रम्प NATO देशों पर भी लगातार दबाव बना रहे हैं। उनका कहना है कि अमेरिका अकेले वैश्विक सुरक्षा का खर्च नहीं उठा सकता और यूरोपीय देशों को अपने रक्षा बजट में इजाफा करना होगा।
चीन को अमेरिका व्यापार, तकनीक और वैश्विक प्रभाव के क्षेत्र में सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी मानता है, जबकि रूस को लेकर भी अमेरिका की नीति टकराव वाली बनी हुई है। ऐसे में दावोस में ट्रम्प का भाषण चीन और रूस दोनों के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।

WEF 2026: दुनिया की सबसे बड़ी बैठक
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 2026 का आयोजन 19 से 23 जनवरी तक दावोस में हो रहा है। इस साल की थीम है – “A Spirit of Dialogue” (संवाद की भावना)।
इस बैठक में:
- 130 से ज्यादा देशों के करीब 3,000 प्रतिनिधि
- 64 देशों के राष्ट्राध्यक्ष या सरकार प्रमुख
- 850 से ज्यादा बड़े CEOs
- 400 से अधिक शीर्ष राजनीतिक नेता
शामिल हो रहे हैं।
भारत के लिए क्यों अहम है WEF 2026
WEF 2026 भारत के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस मंच पर भारत अपनी मजबूत अर्थव्यवस्था, निवेश अवसरों और भविष्य की योजनाओं को वैश्विक मंच पर पेश कर रहा है।
भारत से:
- चार केंद्रीय मंत्री
- छह राज्यों के मुख्यमंत्री
- 100 से ज्यादा भारतीय कारोबारी
दावोस पहुंचे हैं।
भारत निवेश, मैन्युफैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी और डिजिटल विकास पर जोर दे रहा है और विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
जियोपॉलिटिक्स बना सबसे बड़ा फैक्टर
दावोस पहुंचे वैश्विक कारोबारी नेताओं का मानना है कि अब जियोपॉलिटिक्स सिर्फ बैकग्राउंड रिस्क नहीं, बल्कि निवेश और बिजनेस फैसलों का सबसे बड़ा फैक्टर बन चुकी है। सप्लाई चेन, टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप और निवेश अब सीधे राजनीतिक हालात देखकर तय किए जा रहे हैं।
ऐसे में ट्रम्प का दावोस दौरा न सिर्फ अमेरिका, बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था के लिए आने वाले वर्षों की दिशा तय कर सकता है।