नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) के पूर्व अध्यक्ष अनुराग ठाकुर को बड़ी राहत देते हुए उन पर लगाया गया आजीवन प्रतिबंध (लाइफटाइम बैन) हटा दिया है। गुरुवार को शीर्ष अदालत ने अपने करीब 9 साल पुराने फैसले में संशोधन करते हुए कहा कि ठाकुर पर जिंदगी भर का प्रतिबंध न तो उचित था और न ही कोर्ट का ऐसा कोई इरादा रहा है। इस फैसले के बाद अब अनुराग ठाकुर एक बार फिर भारतीय क्रिकेट के प्रशासन और संचालन से जुड़े कार्यों में भाग ले सकेंगे।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच का अहम फैसला
यह फैसला चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने सुनाया। बेंच ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह मामला आनुपातिकता के सिद्धांत (Principle of Proportionality) को लागू करने का है। कोर्ट ने माना कि जिस तरह का प्रतिबंध लगाया गया था, वह परिस्थितियों की तुलना में अत्यधिक था।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रिकॉर्ड पर लिया कि अनुराग ठाकुर पहले ही बिना शर्त माफी मांग चुके थे, जिसे अदालत ने उस समय स्वीकार कर लिया था। ऐसे में उन पर आजीवन प्रतिबंध बनाए रखना न्यायसंगत नहीं था।
अब BCCI के कामकाज में हो सकेंगे शामिल
लाइफटाइम बैन हटने के साथ ही अनुराग ठाकुर के लिए BCCI से जुड़े सभी रास्ते दोबारा खुल गए हैं। अब वे भारतीय क्रिकेट के प्रशासन, बोर्ड की गतिविधियों और संचालन से संबंधित किसी भी भूमिका में शामिल हो सकते हैं। यह फैसला न सिर्फ ठाकुर के लिए बल्कि क्रिकेट प्रशासन से जुड़े मामलों में एक अहम कानूनी मिसाल के तौर पर भी देखा जा रहा है।
2017 में लोढ़ा कमेटी विवाद के चलते हटाए गए थे
गौरतलब है कि साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों को लागू न करने के कारण अनुराग ठाकुर को BCCI अध्यक्ष पद से हटा दिया था। लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों में आयु सीमा, एक पद–एक व्यक्ति का सिद्धांत और सरकारी पद पर बैठे लोगों के बोर्ड में शामिल न होने जैसे कड़े प्रावधान शामिल थे।
कोर्ट का मानना था कि BCCI ने सुधारों को लागू करने में जानबूझकर टालमटोल की और उस समय के अध्यक्ष अनुराग ठाकुर इसकी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।

कोर्ट की अवमानना के आरोप में लगा था बैन
2017 में सुप्रीम कोर्ट ने अनुराग ठाकुर को नोटिस जारी कर पूछा था कि उनके खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए। उन पर आरोप था कि उन्होंने लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों को लागू करने से बचने के लिए इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (ICC) से हस्तक्षेप कराने की कोशिश की और इस संबंध में कोर्ट के सामने गलत बयान दिए।
इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए उन्हें पद से हटाने के साथ-साथ BCCI के किसी भी पद पर बने रहने से रोक दिया था।
सुनवाई में क्या कहा गया
हालिया सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2 जनवरी 2017 के फैसले के निर्देश संख्या 3 और 4 पहले ही वापस लिए जा चुके थे। मौजूदा याचिका सिर्फ अनुराग ठाकुर पर लगाए गए प्रतिबंध से जुड़ी थी।
अनुराग ठाकुर के वकील ने कोर्ट को बताया कि यह प्रतिबंध करीब 9 साल से लागू है और इसे जारी रखने से उन्हें गंभीर व्यक्तिगत और पेशेवर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए प्रतिबंध हटाने का फैसला सुनाया।
फैसले के मायने
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय क्रिकेट प्रशासन के इतिहास में एक अहम मोड़ माना जा रहा है। इससे साफ संकेत मिलता है कि सुधारों के नाम पर दी गई सजा भी न्यायसंगत और संतुलित होनी चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट हुआ कि अदालत सुधार चाहती है, लेकिन अनावश्यक रूप से किसी व्यक्ति को आजीवन दंडित करने के पक्ष में नहीं है।
अब सभी की नजर इस बात पर है कि अनुराग ठाकुर आगे भारतीय क्रिकेट प्रशासन में किस भूमिका में नजर आते हैं और BCCI की राजनीति में यह फैसला क्या नया समीकरण बनाता है।