त्योंथर में 60 साल पुरानी रावण प्रतिमा पर विवाद, आस्था बनाम विकास की बहस तेज |

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रीवा। विंध्य क्षेत्र के त्योंथर नगर में करीब छह दशक पुरानी 10 फीट ऊंची रावण प्रतिमा को लेकर इन दिनों माहौल गर्म है। दशानन मैदान में स्थापित यह प्रतिमा वर्षों से दशहरा के सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में पहचानी जाती रही है, लेकिन हालिया महीनों में फैली बीमारियों और क्षेत्रीय पिछड़ेपन को लेकर इसे “अशुभ” मानने का सिलसिला शुरू हो गया है।

एक पक्ष प्रतिमा हटाने की मांग कर रहा है, तो दूसरा इसे सांस्कृतिक विरासत बताते हुए किसी भी कीमत पर हटाने का विरोध कर रहा है। विवाद बढ़ने पर गांव में बैठकों का दौर चला, लेकिन अब तक कोई सर्वसम्मत निर्णय नहीं निकल सका।


कैसे शुरू हुआ विवाद?

स्थानीय लोगों के अनुसार, लगभग 60 वर्ष पहले लोक निर्माण विभाग (PWD) के एक अधिकारी ने जनसहयोग से यह प्रतिमा स्थापित करवाई थी। तब से दशहरे के अवसर पर यह सांस्कृतिक पहचान का केंद्र रही।

करीब छह महीने पहले क्षेत्र में बुखार, थायराइड, त्वचा रोग और कुछ गंभीर बीमारियों के मामलों में बढ़ोतरी हुई। इसी दौरान सोशल मीडिया पर यह चर्चा फैल गई कि रावण की प्रतिमा “वास्तुदोष” और “नकारात्मक ऊर्जा” का कारण है।

धीरे-धीरे यह चर्चा दो गुटों के टकराव में बदल गई।


प्रतिमा हटाने के पक्ष में क्या तर्क?

  • कुछ ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र लंबे समय से विकास में पिछड़ा है—सड़कें अधूरी, अस्पताल में डॉक्टर नहीं टिकते, रोजगार के अवसर सीमित हैं।
  • उनका मानना है कि “नकारात्मक प्रतीक” हटने से मानसिक और सामाजिक वातावरण में सकारात्मक बदलाव आएगा।
  • कुछ स्थानीय धर्मगुरुओं और ज्योतिषियों ने भी इसे वास्तु दोष से जोड़ते हुए प्रतिमा हटाने की सलाह दी है।
  • सुझाव दिया गया है कि यहां भगवान श्रीराम की प्रतिमा स्थापित की जाए।

एक शिक्षक ने कहा, “अगर मूर्ति हटेगी तो वातावरण शुद्ध होगा और विकास का रास्ता खुलेगा।” वहीं कई महिलाओं का कहना है कि बच्चों की बार-बार बीमारी ने लोगों में भय पैदा कर दिया है।


विरोधी पक्ष का क्या कहना है?

  • समर्थकों का तर्क है कि रावण केवल खलनायक नहीं, बल्कि वेद-शास्त्रों का ज्ञाता और प्रकांड विद्वान था।
  • वे इसे 60 साल पुरानी सांस्कृतिक धरोहर बताते हुए हटाने का कड़ा विरोध कर रहे हैं।
  • उनका कहना है कि बीमारी और पिछड़ेपन के लिए मूर्ति को जिम्मेदार ठहराना अंधविश्वास है।
  • कुछ लोगों ने कानूनी लड़ाई की चेतावनी भी दी है।

एक समाजसेवी ने कहा, “विकास नहीं हो रहा तो उसके लिए प्रशासन जिम्मेदार है, मूर्ति नहीं। प्रतिमा हटाने से अस्पताल या उद्योग नहीं खुलेंगे।”


बैठकों में क्या हुआ?

पिछले सप्ताह दो बैठकों का आयोजन किया गया। पहली बैठक में माहौल गरमा गया और तीखी नोकझोंक हुई। दूसरी बैठक में शांति बनाए रखने की अपील तो हुई, लेकिन कोई ठोस निर्णय नहीं हो सका।

सोशल मीडिया पर एक ओर “मूर्ति हटाओ, गांव बचाओ” अभियान चल रहा है, तो जवाब में “ज्ञान की विरासत बचाओ” पोस्टर जारी किए गए हैं।


प्रशासन और जनप्रतिनिधियों का रुख

  • थाना प्रभारी ने इसे प्रशासनिक विषय बताया।
  • एसडीएम ने कहा कि अभी तक कोई लिखित शिकायत नहीं मिली है; दोनों पक्ष आएंगे तो बातचीत से समाधान निकाला जाएगा।
  • क्षेत्रीय विधायक ने फिलहाल मामले की जानकारी न होने की बात कही है और लौटकर चर्चा के बाद ही टिप्पणी करने की बात कही।

असली सवाल: आस्था या विकास?

त्योंथर लंबे समय से औद्योगिक निवेश और रोजगार के मामले में पिछड़ा माना जाता रहा है। युवाओं का पलायन जारी है। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि क्या किसी प्रतीक को हटाने से विकास संभव है, या फिर यह बहस मूल समस्याओं से ध्यान भटकाने वाली है?

एक वैदिक विद्वान ने भी माना कि “विकास प्रतीकों से नहीं, नीति और कर्म से होता है।”

फिलहाल नगर दो मतों में बंटा है—

  • एक पक्ष इसे अपशकुन का कारण मानता है।
  • दूसरा इसे सांस्कृतिक पहचान और ज्ञान का प्रतीक बताता है।

अब निगाहें प्रशासन की पहल और सामाजिक संवाद पर टिकी हैं कि क्या बातचीत से समाधान निकलेगा या विवाद और गहराएगा।

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