विकासखंड देवरी अंतर्गत ग्राम पंचायत जमनापुर (परासिया) में किसान चौपाल का आयोजन किया गया, जिसमें किसानों को नरवाई न जलाने के प्रति जागरूक किया गया तथा इसके वैज्ञानिक एवं पर्यावरणीय दुष्प्रभावों की विस्तृत जानकारी दी गई। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों को पराली एवं नरवाई के सुरक्षित और लाभकारी प्रबंधन के लिए प्रेरित करना रहा।
चौपाल में विशेषज्ञों एवं अधिकारियों ने बताया कि नरवाई जलाने से भूमि की उर्वरता पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे मिट्टी में उपस्थित लाभकारी सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं, जिससे मिट्टी की प्राकृतिक संरचना कमजोर हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप भूमि कठोर हो जाती है और उसमें आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा घट जाती है, जिसका सीधा असर फसल उत्पादन पर पड़ता है। किसानों को यह भी समझाया गया कि बार-बार नरवाई जलाने से भूमि की उत्पादकता दीर्घकाल में काफी कम हो सकती है।
कार्यक्रम में किसानों को नरवाई के वैकल्पिक उपयोगों के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी गई। उन्हें बताया गया कि नरवाई को भूसा बनाकर पशुओं के चारे के रूप में उपयोग किया जा सकता है, जिससे पशुपालन में भी लाभ मिलता है और अतिरिक्त आय का स्रोत भी तैयार होता है। इसके साथ ही किसानों को वेस्ट डिकंपोजर के उपयोग की विधि समझाई गई, जिसके माध्यम से नरवाई को प्राकृतिक खाद में परिवर्तित किया जा सकता है। इससे मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ती है तथा उसकी उर्वरता में सुधार होता है।

इसके अलावा किसानों को नरवाई को बंडल बनाकर जैविक मल्चिंग के रूप में उपयोग करने की सलाह दी गई। इससे न केवल मिट्टी की नमी संरक्षित रहती है, बल्कि आगामी फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन में भी सुधार होता है। इस तकनीक को पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया।
चौपाल में यह भी जानकारी दी गई कि किसान ई-विकास प्रणाली के माध्यम से ही खाद की खरीदी करें, जिससे पारदर्शिता बनी रहे और किसी प्रकार की अनियमितता की संभावना समाप्त हो सके। इस व्यवस्था से किसानों को समय पर और उचित दर पर खाद उपलब्ध हो सकेगी।

कार्यक्रम के अंत में उपस्थित किसानों ने नरवाई न जलाने और इसके वैकल्पिक प्रबंधन को अपनाने का संकल्प लिया। उन्होंने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार के जागरूकता कार्यक्रमों से खेती की आधुनिक एवं वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाने में मदद मिलती है तथा पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है।
यह चौपाल किसानों में पर्यावरण संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य और सतत कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूकता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुई।