मध्यप्रदेश के इंदौर जिला न्यायालय ने एक चर्चित POCSO मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए आरोपी युवक को बरी कर दिया है। अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट कहा कि मामले में पेश किए गए साक्ष्य संदेह से परे अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। साथ ही कोर्ट ने पुलिस जांच की गुणवत्ता और शिकायतकर्ता के बयानों में गंभीर विरोधाभासों पर कड़ी टिप्पणी की है।
यह मामला तुकोगंज थाना क्षेत्र का है, जहां जून 2023 में एक नाबालिग लड़की ने एक युवक के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि युवक उसका पीछा करता था, घर में घुसकर अशोभनीय हरकत की और विरोध करने पर जान से मारने की धमकी दी। इसके आधार पर पुलिस ने छेड़छाड़, धमकी और POCSO एक्ट की धाराओं में मामला दर्ज कर अदालत में चालान पेश किया था।
करीब दो वर्षों तक चले ट्रायल के दौरान अदालत के सामने कई ऐसे तथ्य आए, जिन्होंने पूरे मामले की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए। अदालत ने पाया कि FIR में दर्ज घटनाओं और अदालत में दिए गए बयानों में स्पष्ट अंतर है। इसके अलावा, जिस सेल्फी फोटो को घटना का आधार बताया गया था, उसे पुलिस ने न तो ठीक से जब्त किया और न ही साक्ष्य के रूप में पेश किया।
जांच में गंभीर खामियां उजागर
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि शिकायत में जिस मोबाइल फोन के टूटने का जिक्र किया गया था, वह भी केस रिकॉर्ड में प्रस्तुत नहीं किया गया। इतना ही नहीं, घटना के प्रत्यक्षदर्शी बताए गए भाई को भी गवाह के रूप में अदालत में पेश नहीं किया गया, जिससे जांच की गंभीरता पर सवाल उठे।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जांच एजेंसियों ने महत्वपूर्ण साक्ष्य एकत्र करने में लापरवाही बरती, जिससे केस की बुनियादी कड़ियां कमजोर हो गईं। कोर्ट ने यह भी माना कि पूरे मामले को संभवतः बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है।
बचाव पक्ष के तर्क
बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने अदालत में तर्क दिया कि आरोपी और पीड़िता के बीच पहले से आपसी संबंध थे। इस संबंध के डिजिटल सबूत भी अदालत में पेश किए गए। इन साक्ष्यों के आधार पर यह दावा किया गया कि मामला एकतरफा आरोपों पर आधारित है।
जिरह के दौरान पीड़िता की मां के बयान में भी ऐसे तथ्य सामने आए जो प्रारंभिक शिकायत से मेल नहीं खाते थे। इससे मामले की विश्वसनीयता और कमजोर हुई।
कोर्ट का अहम निष्कर्ष
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह साबित नहीं होता कि आरोपी ने किसी प्रकार का आपराधिक बल प्रयोग या यौन अपराध किया हो। इसलिए संदेह का लाभ देते हुए आरोपी को दोषमुक्त किया जाता है।
POCSO मामलों में जांच पर सवाल
यह फैसला ऐसे समय आया है जब देशभर में POCSO मामलों की जांच प्रक्रिया को लेकर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों को अत्यंत सावधानी और निष्पक्षता के साथ साक्ष्य एकत्र करने चाहिए, क्योंकि एक छोटी सी चूक भी पूरे केस को प्रभावित कर सकती है।
न्याय व्यवस्था की अहम सीख
यह मामला न्याय व्यवस्था के लिए भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है कि केवल आरोप लगना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर ही किसी को दोषी ठहराया जा सकता है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि जांच की गुणवत्ता सुधारना जरूरी है, ताकि वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिल सके और निर्दोष लोग अनावश्यक रूप से फंसें नहीं।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, इंदौर का यह POCSO मामला न्यायिक प्रक्रिया की जटिलताओं और जांच की जिम्मेदारी को उजागर करता है। अदालत का यह फैसला जहां एक ओर आरोपी के लिए राहत लेकर आया, वहीं दूसरी ओर जांच प्रणाली पर गंभीर सवाल भी खड़े करता है। यह मामला भविष्य में ऐसे संवेदनशील मामलों की जांच और सुनवाई के लिए एक महत्वपूर्ण सीख के रूप में देखा जा रहा है।