मुख्यमंत्री का संदेश: “नदियां और बावड़ियां ही मध्यप्रदेश का असली श्रृंगार”, गंगा दशहरा पर जल संरक्षण का लिया संकल्प !

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भोपाल। गंगा दशहरा के पावन अवसर पर डॉ. मोहन यादव ने प्रदेशवासियों को जल संरक्षण का संदेश देते हुए कहा कि मध्यप्रदेश की नदियां, तालाब और बावड़ियां ही राज्य का वास्तविक श्रृंगार हैं। उन्होंने नागरिकों से जल की हर बूंद को सहेजने का संकल्प लेने की अपील करते हुए कहा कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए जल संरक्षण अब केवल विकल्प नहीं बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी बन चुका है।

भोपाल से जारी अपने संदेश और ब्लॉग में मुख्यमंत्री ने भारतीय संस्कृति में नदियों और जल स्रोतों के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में नदियों को देवी स्वरूप माना गया है और जल संरक्षण सदियों से हमारी संस्कृति और जीवनशैली का हिस्सा रहा है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में जल संरक्षण को जन आंदोलन का रूप मिला है। “जल है तो कल है” का संकल्प अब केवल नारा नहीं बल्कि राष्ट्रीय मिशन बन चुका है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा जल शक्ति मंत्रालय का गठन, नमामि गंगे अभियान और अमृत सरोवर योजना जैसे प्रयासों ने देश की जल सुरक्षा को नई दिशा दी है।

मुख्यमंत्री ने बताया कि देशभर में 70 हजार से अधिक अमृत सरोवर तैयार किए जा चुके हैं, जिनसे वर्षा जल संचयन और भूजल रिचार्ज की क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश भी इस दिशा में तेजी से कार्य कर रहा है और राज्य सरकार जल संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है।

डॉ. यादव ने जानकारी दी कि प्रदेश में “जल गंगा संवर्धन अभियान” पूरे जोर-शोर से चलाया जा रहा है। वर्ष 2025 में अभियान की सफलता के बाद 2026 में भी इसे 19 मार्च से 30 जून तक सक्रिय रूप से संचालित किया जा रहा है। इस अभियान के तहत प्रदेश की नदियों, तालाबों, कुओं और ऐतिहासिक बावड़ियों के संरक्षण और जीर्णोद्धार का कार्य बड़े स्तर पर किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि सरकार इस परियोजना पर लगभग 2500 करोड़ रुपए खर्च कर रही है। अभियान के तहत 10 हजार से अधिक चेकडैम और स्टॉपडैम का संधारण किया जा रहा है, जिससे जल संरक्षण और सिंचाई व्यवस्था को मजबूत बनाया जा सके।

मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि मध्यप्रदेश एक कृषि प्रधान राज्य है और यहां की अर्थव्यवस्था सीधे तौर पर जल संसाधनों पर निर्भर करती है। यदि जल संरचनाएं मजबूत होंगी तो किसानों की आय बढ़ेगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था सशक्त होगी।

उन्होंने “रिज-टू-वैली” मॉडल और आधुनिक सिंचाई तकनीकों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन योजनाओं के माध्यम से जल का बेहतर प्रबंधन किया जा रहा है। इससे खेतों तक पर्याप्त पानी पहुंचाने और जल बर्बादी रोकने में मदद मिल रही है।

डॉ. यादव ने प्रदेश की प्राचीन बावड़ियों और तालाबों को सांस्कृतिक धरोहर बताते हुए कहा कि ये केवल जल स्रोत नहीं बल्कि मध्यप्रदेश की ऐतिहासिक पहचान हैं। इनके संरक्षण से जहां जल संकट कम होगा, वहीं पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि कई ऐतिहासिक बावड़ियां और जल संरचनाएं वर्षों से उपेक्षित थीं, लेकिन अब सरकार उन्हें पुनर्जीवित करने का कार्य कर रही है। इससे स्थानीय लोगों को भी लाभ मिलेगा और आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ सकेंगी।

अपने संदेश में मुख्यमंत्री ने इस पूरे अभियान को केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं बल्कि जनभागीदारी का आंदोलन बताया। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक समाज का हर वर्ग इसमें भागीदारी न करे।

उन्होंने “पानी चौपाल” जैसे कार्यक्रमों के जरिए महिलाओं, युवाओं और ग्रामीण समुदायों को अभियान से जोड़ने की बात कही। मुख्यमंत्री ने कहा कि जल संरक्षण की शुरुआत घर और गांव से ही होती है। यदि हर नागरिक जल बचाने का संकल्प ले तो प्रदेश में जल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

मुख्यमंत्री ने प्रदेशवासियों से अपील की कि वे गंगा दशहरा के अवसर पर जल की एक-एक बूंद बचाने का संकल्प लें। उन्होंने कहा कि आज यदि हम अपने जल स्रोतों की रक्षा करेंगे, तभी भविष्य सुरक्षित और समृद्ध बन पाएगा।

सरकार द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, “जल गंगा संवर्धन अभियान” के तहत 2500 से अधिक प्राचीन बावड़ियों और तालाबों के पुनरुद्धार का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही हजारों चेकडैम और स्टॉपडैम के रखरखाव का कार्य भी जारी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ती गर्मी, भूजल स्तर में गिरावट और जल संकट की चुनौतियों के बीच ऐसे अभियान भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।

गंगा दशहरा के अवसर पर मुख्यमंत्री का यह संदेश केवल धार्मिक या सांस्कृतिक अपील नहीं बल्कि जल संरक्षण को लेकर एक व्यापक सामाजिक चेतना का आह्वान माना जा रहा है।

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