54 हजार से ज्यादा पेड़ों की कटाई के बाद पुराने रूट पर फिर मंथन, रेल मंत्री ने दिए दोबारा अध्ययन के निर्देश !

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भोपाल/पन्ना। खजुराहो-पन्ना रेल परियोजना में 54,578 पेड़ों की कटाई के बाद अब नया विवाद खड़ा हो गया है। रेल मंत्री Ashwini Vaishnaw ने बुधवार को उस पुराने एलाइनमेंट (रूट) पर दोबारा तकनीकी अध्ययन कराने के निर्देश दिए हैं, जहां पहले ही बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई की जा चुकी है। रेल मंत्री के इस निर्देश के बाद परियोजना को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं, क्योंकि पहले रेलवे अधिकारियों द्वारा इसी रूट को तकनीकी रूप से अनुपयुक्त बताते हुए बदलाव का निर्णय लिया गया था।

जानकारी के अनुसार रेल मंत्री ने तकनीकी विशेषज्ञों की टीम को ड्रोन फोटोग्राफी, टोपोशीट और जमीनी सर्वे के आधार पर दोबारा जांच करने के निर्देश दिए हैं। विशेषज्ञ यह आकलन करेंगे कि क्या पुराने एलाइनमेंट पर ही सुरक्षित और व्यवहारिक तरीके से रेल लाइन बिछाई जा सकती है। यदि रिपोर्ट में पुराना रूट उपयुक्त पाया जाता है, तो यह मामला और अधिक गंभीर हो सकता है, क्योंकि हजारों पेड़ों की कटाई के बाद रूट बदलने के निर्णय पर पहले ही सवाल उठ रहे हैं।

इस परियोजना को मध्यप्रदेश और बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खजुराहो और पन्ना को रेल नेटवर्क से बेहतर तरीके से जोड़ने के उद्देश्य से शुरू की गई इस परियोजना का मकसद पर्यटन, व्यापार और स्थानीय आवागमन को बढ़ावा देना है। लेकिन अब परियोजना तकनीकी त्रुटियों, पर्यावरणीय नुकसान और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर विवादों में घिरती जा रही है।

रेलवे सूत्रों के मुताबिक शुरुआती एलाइनमेंट के आधार पर ही पर्यावरण और वन विभाग से मंजूरियां ली गई थीं। इसी रूट को ध्यान में रखकर बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई भी की गई। बाद में रेलवे अधिकारियों ने दावा किया कि प्रारंभिक डिजाइन में कई तकनीकी खामियां थीं, जिसके कारण एलाइनमेंट बदलना पड़ा। इस बदलाव के चलते परियोजना लगभग तीन वर्ष पीछे चली गई और करोड़ों रुपए का अतिरिक्त भार भी बढ़ गया।

अब जब रेल मंत्री ने पुराने रूट पर दोबारा अध्ययन के निर्देश दिए हैं, तब यह सवाल और गंभीर हो गया है कि यदि पुराना रूट व्यवहारिक था तो फिर पेड़ों की कटाई और रूट बदलने का फैसला क्यों लिया गया। वहीं यदि प्रारंभिक डिजाइन में खामियां थीं, तो उस समय तकनीकी मंजूरी देने वाले अधिकारियों की जवाबदेही क्यों तय नहीं की गई।

पश्चिम मध्य रेलवे, जबलपुर ने इस पूरे मामले पर सफाई देते हुए कहा है कि पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए कटे हुए पेड़ों के बदले दोगुने से अधिक पौधे लगाए जाएंगे। रेलवे अधिकारियों के अनुसार अगले मानसून से पहले व्यापक स्तर पर पौधरोपण अभियान चलाया जाएगा। हालांकि पर्यावरणविदों का कहना है कि वर्षों पुराने हजारों पेड़ों की भरपाई केवल पौधे लगाकर नहीं की जा सकती।

मामले की गंभीरता को देखते हुए पश्चिम मध्य रेलवे के अतिरिक्त महाप्रबंधक द्वारा तीन सदस्यीय जांच समिति भी गठित की गई है। यह समिति पूरे घटनाक्रम की जांच करेगी और यह पता लगाएगी कि एलाइनमेंट में बदलाव क्यों किया गया, तकनीकी त्रुटियां कहां हुईं और इससे परियोजना को कितना नुकसान पहुंचा। समिति अपनी रिपोर्ट रेलवे प्रशासन को सौंपेगी, जिसके बाद आगे की कार्रवाई तय होगी।

हालांकि अब भी सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि इस पूरे मामले में जिम्मेदारी किसकी तय होगी। परियोजना की शुरुआती डीपीआर (डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट) तैयार करने, तकनीकी स्वीकृति देने और बाद में रूट बदलने के निर्णय में शामिल अधिकारियों पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। करोड़ों रुपए खर्च होने, हजारों पेड़ों की कटाई और परियोजना में वर्षों की देरी के बावजूद किसी अधिकारी की जवाबदेही तय न होना प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है।

पर्यावरण विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि इस तरह की परियोजनाओं में तकनीकी सर्वे और पर्यावरणीय अध्ययन पूरी गंभीरता और पारदर्शिता से किए जाने चाहिए। यदि शुरुआती स्तर पर ही सटीक योजना बनाई जाती, तो न केवल पर्यावरणीय नुकसान रोका जा सकता था बल्कि सरकारी धन और समय की भी बचत होती।

अब सभी की नजर तकनीकी विशेषज्ञों की नई रिपोर्ट और जांच समिति की सिफारिशों पर टिकी हुई है। यह रिपोर्ट तय करेगी कि परियोजना पुराने रूट पर आगे बढ़ेगी या बदले हुए एलाइनमेंट पर ही काम जारी रहेगा। साथ ही यह भी देखने वाली बात होगी कि क्या इस पूरे मामले में किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जाती है या नहीं।

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