भोपाल:
मशहूर शायर बशीर बद्र अब इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन उनके अशआर, उनका अंदाज और उनकी मोहब्बत से भरी शायरी हमेशा जिंदा रहेगी। ईद के दिन उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके बेटे तैयब बद्र ने नम आंखों से अपने पिता को याद करते हुए कहा— “दुनिया उन्हें डॉ. बशीर बद्र के नाम से जानती थी, लेकिन मेरे लिए वे सिर्फ अब्बा थे।”
तैयब बद्र ने बताया कि पिछले 10-12 वर्षों से बशीर बद्र डिमेंशिया जैसी बीमारी से जूझ रहे थे। धीरे-धीरे उनकी याददाश्त कमजोर होती चली गई, शरीर के सामान्य कार्य प्रभावित होने लगे, लेकिन उनकी मुस्कान और जिंदादिली कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
वे बताते हैं कि कई बार बशीर बद्र अपना नाम, जगह या लोगों को भूल जाते थे, लेकिन अपने मशहूर शेर नहीं भूलते थे। अगर कोई सामने कह देता—
“उजाले अपनी यादों के…”
तो वे तुरंत अगला मिसरा पढ़ देते—
“न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए…”
उनके बेटे के मुताबिक, शायरी उनके भीतर एक स्वाभाविक धड़कन की तरह बस चुकी थी।

“मुशायरों से एग्जिट भी अपनी शर्तों पर”
बशीर बद्र ने करीब 12-15 साल पहले ही मुशायरों में जाना बंद कर दिया था। वे अक्सर कहा करते थे—
“मैं शोमैन हूं। मुशायरों में मेरी एक इमेज है और मैं एग्जिट भी अपनी शर्तों पर लेना चाहता हूं।”
उनकी यही सोच उनकी जिंदगी में भी दिखाई दी। उन्होंने शोर-शराबे से दूर होकर अपनी दुनिया खुद तय की।
मेरठ दंगे: जिसने जिंदगी बदल दी
1987 के मेरठ दंगे उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा दर्द बनकर सामने आए। दंगों में उनका घर जला दिया गया। सिर्फ मकान ही नहीं, उनकी किताबें, अप्रकाशित गजलें, कागज और जीवनभर की यादें भी राख हो गईं।
उस समय एक मैगजीन में उनकी तस्वीर छपी थी— हाथ में सूटकेस और झोला लिए मुस्कुराते हुए। तस्वीर के साथ लिखा था—
“आप घर तोड़ सकते हैं, हौसला नहीं।”
बाद में यही दर्द उनके मशहूर शेर में उतर आया—
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।”
मेरठ दंगों के बाद उन्होंने भोपाल को अपना ठिकाना बना लिया। भोपाल के ईदगाह इलाके में उन्होंने अपना नया आशियाना बसाया।

भारत-पाक रिश्तों की भाषा बने उनके शेर
बशीर बद्र के अशआर सिर्फ मुशायरों तक सीमित नहीं रहे। भारत-पाक रिश्तों और राजनीति में भी उनके शेर बार-बार गूंजते रहे।
शिमला समझौते के बाद उनका यह शेर चर्चा में आया—
“दुश्मनी जम के करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।”
1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा के दौरान बस पर उनका मशहूर शेर लिखा गया था—
“दुश्मनी का सफर एक कदम दो कदम,
तुम भी थक जाओगे, हम भी थक जाएंगे।”
कारगिल युद्ध के बाद भी उनके शेर राजनीतिक मंचों और मुशायरों में सुनाई देते रहे।
विशाल भारद्वाज ने याददाश्त से लौटाईं गजलें
मेरठ दंगों में बशीर बद्र की हजारों गजलें और अशआर जल गए थे। उनके छात्र रह चुके विशाल भारद्वाज ने अपनी याददाश्त के सहारे उनकी कई गजलें दोबारा लिखकर उन्हें लौटाईं। बताया जाता है कि विशाल भारद्वाज उन्हें पिता समान मानते थे और अक्सर उनसे मिलने भोपाल आते थे।
48 साल बाद मिली पीएचडी की डिग्री
बशीर बद्र ने 1973 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में अपनी पीएचडी थीसिस जमा की थी, लेकिन व्यस्तता के कारण डिग्री लेना भूल गए। आखिरकार 2021 में, पूरे 48 साल बाद उनकी पीएचडी डिग्री उनके घर पहुंची।
परिवार के अनुसार, डिग्री को हाथ में लेकर वे किसी बच्चे की तरह खुश हो गए थे।
“बशीर बद्र सिर्फ उर्दू के नहीं, पूरे मुल्क की रूह थे”
मशहूर गजल गायक तलत अजीज ने उन्हें याद करते हुए कहा—
“बशीर बद्र सिर्फ उर्दू के नहीं, पूरे मुल्क की रूह के शायर थे।”
उन्होंने बताया कि बशीर बद्र अपनी नई गजलें इनलैंड लेटर में लिखकर भेजा करते थे। उनके रिश्तों में अपनापन और सादगी थी। बीमारी के दौर में भी वे गजलें पहचान लेते थे और लोगों का हाथ पकड़कर अपनापन जताते थे।
बच्चों और बेटियों पर उनके मशहूर अशआर
बशीर बद्र के कई शेर आज भी लोगों की जुबान पर हैं। खासतौर पर बच्चों और बेटियों पर लिखे उनके ये अशआर बेहद मशहूर हुए—
“उड़ने दो परिंदों को अभी शोख हवा में,
फिर लौट के बचपन के जमाने नहीं आते।”
और—
“वो शाख है न फूल, अगर तितलियाँ न हों,
वो घर भी कोई घर है जहां बच्चियां न हों।”
बशीर बद्र अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी शायरी, उनका दर्द और मोहब्बत से भरा नजरिया हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेगा।