इंदौर। पॉक्सो स्पेशल कोर्ट इंदौर ने एक बेहद संवेदनशील मामले में 78 वर्षीय आरोपी प्रभाकर बापट को दोषी ठहराते हुए पांच वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। कोर्ट ने आरोपी पर 30 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया है। न्यायाधीश रमा जयंत मित्तल ने 30 मई 2026 को फैसला सुनाया, जिसका लिखित आदेश 3 जून को जारी किया गया। यह मामला 12 वर्षीय नाबालिग बालिका के साथ लगातार पीछा करने, छेड़छाड़ और अशोभनीय इशारे करने का है।
मामला क्या था?
30 अक्टूबर 2023 को इंदौर की एक सामाजिक संस्था की प्रतिनिधि पीड़िता के घर पहुंची। उन्होंने बालिका की मां को बताया कि उनकी बेटी के साथ पड़ोस में रहने वाले बुजुर्ग व्यक्ति द्वारा अनुचित व्यवहार किया जा रहा है। संस्था के पास उपलब्ध वीडियो साक्ष्य देखने के बाद मां ने बेटी से विस्तार से पूछताछ की। तब बालिका ने अपने साथ हुई घटनाओं का खुलासा किया, जो सुनकर परिवार स्तब्ध रह गया।

पीड़िता ने बताया कि आरोपी प्रभाकर बापट (78) पड़ोस में रहते थे। वह रोजाना स्कूल जाते समय उसका पीछा करता था। रास्ते में रोककर बात करने की कोशिश करता, बस स्टॉप तक उसके साथ चलता और कई बार बेहद करीब आने की कोशिश करता। बालिका को इन हरकतों से बहुत असहजता और भय महसूस होता था। उसने शुरुआत में परिवार को इस बारे में नहीं बताया क्योंकि वह डरी हुई थी।
बहलाने की कोशिश और लगातार परेशान करना
बालिका ने अपनी मां को बताया कि एक दिन आरोपी बस स्टॉप तक उसके साथ गया और उसे 10 रुपये देकर बहलाने की कोशिश की। वह लगातार उसके पीछे-पीछे आता रहता था। अक्टूबर 2023 में आरोपी ने उसके घर के बाहर आकर आपत्तिजनक इशारे किए। स्कूल जाते समय भी कई मौकों पर छेड़छाड़ की कोशिश की। 27 अक्टूबर 2023 को बस स्टॉप के पास फिर से अनुचित व्यवहार किया, जिसका बालिका ने विरोध किया।
ये घटनाएं बालिका के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरे असर डाल रही थीं। वह स्कूल जाते समय डर के मारे कांपने लगती थी। सामाजिक संस्था द्वारा उपलब्ध कराए गए वीडियो में आरोपी की कुछ हरकतें दर्ज थीं, जो साक्ष्य के रूप में महत्वपूर्ण साबित हुईं।
पुलिस कार्रवाई और कानूनी प्रक्रिया
मामले की गंभीरता को देखते हुए पीड़िता की मां ने थाना परदेशीपुरा में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने आरोपी प्रभाकर बापट के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (भादंवि) की धारा 354 (महिला की गरिमा भंग करने वाली छेड़छाड़), 354-घ, 341 (गैरकानूनी रोक), पॉक्सो अधिनियम की विभिन्न धाराओं (11(4)/12 और 9(एल)/10) तथा अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज किया।
जांच के दौरान बालिका का मेडिकल परीक्षण कराया गया। प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के बयान दर्ज किए गए। पुलिस ने पर्याप्त साक्ष्य जुटाए और आरोपी को गिरफ्तार कर कोर्ट में चालान पेश किया।
कोर्ट में सुनवाई और साक्ष्य
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने नौ गवाहों की गवाही पेश की। इनमें बालिका, उसकी मां, सामाजिक संस्था की प्रतिनिधि, पड़ोसी और पुलिस अधिकारी शामिल थे। दस्तावेजी साक्ष्य, वीडियो क्लिप और मेडिकल रिपोर्ट को भी कोर्ट के समक्ष रखा गया।
विशेष लोक अभियोजक वर्षा पाठक ने शासन की ओर से मजबूत पैरवी की। रजेन्द्र सिंह भदौरिया (प्रभारी डिप्टी डायरेक्टर अभियोजन) ने बताया कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य इतने मजबूत और विश्वसनीय थे कि कोर्ट ने उन्हें पर्याप्त मानते हुए आरोपी को सभी आरोपों में दोषी ठहराया।
न्यायाधीश रमा जयंत मित्तल ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुनाया। कोर्ट ने पाया कि आरोपी की हरकतें न केवल POCSO अधिनियम के अंतर्गत यौनिक उत्पीड़न की श्रेणी में आती हैं, बल्कि बालिका की मानसिक शांति को भी गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं।
सजा का महत्व
कोर्ट ने आरोपी को पॉक्सो अधिनियम की धाराओं के तहत अधिकतम 5 वर्ष के सश्रम कारावास और 30 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई। यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आरोपी 78 वर्ष की उम्र के हैं, फिर भी कोर्ट ने नाबालिग की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए सख्त रुख अपनाया।
समाज के लिए संदेश
यह मामला बालिकाओं की सुरक्षा को लेकर समाज में जागरूकता की जरूरत को रेखांक आज भी कई बच्चे डर के मारे अपने साथ होने वाली ऐसी घटनाओं को परिवार तक नहीं बताते। सामाजिक संस्थाओं की भूमिका यहां सराहनीय रही, जिन्होंने समय पर हस्तक्षेप किया।
पॉक्सो अधिनियम 2012 बालकों के यौनिक शोषण से सुरक्षा के लिए बनाया गया एक सख्त कानून है। इसमें जांच और सुनवाई दोनों को समयबद्ध रखा गया है। इंदौर जैसे शहरों में बढ़ते शहरीकरण और बदलते सामाजिक ढांचे में बुजुर्गों द्वारा भी ऐसे अपराधों के मामले सामने आ रहे हैं, जो पहले कम देखे जाते थे।
परिवार की पीड़ा और राहत
पीड़िता का परिवार अब कुछ राहत महसूस कर रहा है। मां ने बताया कि बेटी अब धीरे-धीरे सामान्य जीवन जीने की कोशिश कर रही है। लेकिन इस घटना ने पूरे परिवार को मानसिक आघात पहुंचाया है। वे चाहते हैं कि समाज में ऐसी घटनाओं पर सख्त नजर रखी जाए और बच्चे खुलकर अपनी बात रख सकें।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के मामलों में वीडियो साक्ष्य, बच्चे की गवाही और त्वरित पुलिस कार्रवाई निर्णायक भूमिका निभाती है। कोर्ट ने भी साक्ष्यों की विश्वसनीयता को आधार बनाकर फैसला दिया, जो न्याय व्यवस्था में विश्वास बढ़ाता है।
78 वर्षीय प्रभाकर बापट को मिली सजा बाल यौनिक उत्पीड़न के खिलाफ सख्त संदेश है। यह दर्शाता है कि उम्र चाहे जो भी हो, अपराध करने पर कोई भी बच नहीं सकता। इंदौर पुलिस और न्यायालय ने इस मामले में संवेदनशीलता और दक्षता दोनों दिखाई।
परिवार, सामाजिक संस्थाओं और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के समन्वय से ही ऐसे मामलों पर अंकुश लगाया जा सकता है। समाज को भी जागरूक होना होगा कि बच्चे सुरक्षित महसूस करें और किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ या पीछा किए जाने पर तुरंत शिकायत करें।