जैन धर्म ने तलवार से नहीं, संस्कारों से विश्व में सम्मान पाया : अविराज सिंह !

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सानौधा। सानौधा में आयोजित श्री 1008 मज्जिनेन्द्र जिनबिम्ब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा गजरथ महोत्सव धार्मिक आस्था, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना का अद्भुत संगम बनकर सामने आया। परम पूज्य मुनि श्री 108 विशद सागर जी महाराज एवं परम पूज्य मुनि श्री 108 शिवसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में सकल दिगम्बर जैन समाज द्वारा आयोजित इस भव्य आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। कार्यक्रम में युवा नेता अविराज सिंह ने सहभागिता करते हुए जैन धर्म की महान परंपराओं, संस्कारों और आध्यात्मिक मूल्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

अपने संबोधन में अविराज सिंह ने कहा कि गजरथ महोत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जैन धर्म की गौरवशाली परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को जन-जन तक पहुंचाने का प्रभावी माध्यम है। ऐसे आयोजन समाज को एक सूत्र में बांधने का कार्य करते हैं और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, धर्म और नैतिक मूल्यों से जोड़ते हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जब युवा आधुनिकता की दौड़ में अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं, तब ऐसे धार्मिक आयोजन उन्हें अपनी पहचान और विरासत से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।

अविराज सिंह ने परम पूज्य मुनि श्री 108 विशद सागर जी महाराज, परम पूज्य मुनि श्री 108 शिवसागर जी महाराज तथा आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के चरणों में श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए कहा कि संतों और आचार्यों का मार्गदर्शन समाज को सदैव सही दिशा प्रदान करता है। उन्होंने आयोजन समिति और समस्त श्रद्धालुओं को इस भव्य आयोजन की सफलता के लिए शुभकामनाएं भी दीं।

उन्होंने कहा कि गजरथ महोत्सव जैन समाज की एक गौरवशाली परंपरा है, जिसके माध्यम से भगवान महावीर स्वामी और सभी तीर्थंकरों के प्रति श्रद्धा, भक्ति और समर्पण व्यक्त किया जाता है। जैन धर्म में गज को गरिमा, शक्ति और महानता का प्रतीक माना गया है, जबकि रथ धर्म विजय और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है। इस प्रकार गजरथ महोत्सव केवल एक शोभायात्रा नहीं बल्कि धर्म, संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों के प्रचार-प्रसार का सशक्त माध्यम है।

युवा पीढ़ी को संबोधित करते हुए अविराज सिंह ने कहा कि ऐसे आयोजनों का सबसे बड़ा लाभ युवाओं को मिलता है। इससे उन्हें जैन धर्म के सिद्धांतों, आदर्शों और जीवन मूल्यों को समझने का अवसर प्राप्त होता है। धार्मिक और आध्यात्मिक वातावरण युवाओं को सकारात्मक दिशा देता है तथा उन्हें नशे, हिंसा और अन्य सामाजिक बुराइयों से दूर रखने में मदद करता है। उन्होंने कहा कि जब युवा अपनी संस्कृति और परंपराओं को समझेंगे, तभी समाज और राष्ट्र का भविष्य मजबूत होगा।

अविराज सिंह ने कहा कि जैन धर्म ने विश्व में अपनी पहचान तलवारों और युद्धों के बल पर नहीं, बल्कि अहिंसा, संयम, करुणा और संस्कारों के आधार पर स्थापित की है। उन्होंने कहा कि इतिहास इस बात का साक्षी है कि जैन धर्म ने कभी किसी पर अपने विचार थोपने का प्रयास नहीं किया, बल्कि अपने आदर्शों और श्रेष्ठ आचरण के माध्यम से सम्मान अर्जित किया। जैन दर्शन मानवता को शांति, सहिष्णुता और आत्मकल्याण का मार्ग दिखाता है।

उन्होंने कहा कि शब्दों के माध्यम से दुनिया को प्रभावित किया जा सकता है, लेकिन मौन साधना आत्मा को शुद्ध करने का सबसे बड़ा साधन है। यही कारण है कि जैन धर्म आज भी करोड़ों लोगों को आध्यात्मिक शांति और आत्मिक उन्नति की प्रेरणा प्रदान कर रहा है।

विश्व पर्यावरण दिवस का उल्लेख करते हुए अविराज सिंह ने कहा कि जैन धर्म की शिक्षाएं पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में अत्यंत प्रासंगिक हैं। जैन दर्शन पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और वनस्पति सहित प्रत्येक जीव में जीवन का अस्तित्व स्वीकार करता है। प्रत्येक जीव के प्रति करुणा और संवेदनशीलता का भाव ही जैन धर्म की मूल चेतना है। उन्होंने कहा कि आज पूरा विश्व पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता बचाने की बात कर रहा है, जबकि जैन धर्म हजारों वर्षों से इन मूल्यों को अपने जीवन का हिस्सा बनाए हुए है।

उन्होंने बताया कि जैन समाज देशभर में पांच हजार से अधिक गौशालाओं का संचालन कर रहा है, जो जीवदया और सेवा भावना का उत्कृष्ट उदाहरण है। भगवान महावीर स्वामी ने सभी प्राणियों के प्रति दया, सेवा और सहयोग का संदेश दिया था। जैन समाज आज भी गौसेवा, जीवदया और परोपकार के माध्यम से उन शिक्षाओं को जीवंत बनाए हुए है।

अविराज सिंह ने आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के विचारों को युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बताते हुए कहा कि उनका मानना था कि शिक्षा केवल धन कमाने का माध्यम नहीं होनी चाहिए। वास्तविक शिक्षा वही है जो व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करे, उसे आत्मनिर्भर बनाए और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव विकसित करे। आज के समय में युवाओं को ऐसे ही जीवन मूल्यों की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि धन जीवन का साधन हो सकता है, लेकिन जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं। धन केवल भौतिक सुख प्रदान कर सकता है, जबकि धर्म मनुष्य को आत्मिक शांति, संतुलन और जीवन जीने की सही दिशा देता है। भगवान महावीर स्वामी और आचार्य विद्यासागर जी महाराज के विचार आज भी मानव समाज को नैतिकता, संयम, सेवा और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग दिखा रहे हैं।

कार्यक्रम में श्रद्धालुओं ने भक्ति और उत्साह के साथ भाग लिया। धार्मिक अनुष्ठानों, प्रवचनों और सांस्कृतिक गतिविधियों के बीच गजरथ महोत्सव ने समाज को आध्यात्मिक ऊर्जा और सामाजिक एकता का संदेश दिया। आयोजन ने यह संदेश भी दिया कि भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराएं आज भी समाज को जोड़ने और सकारात्मक दिशा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

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