उज्जैन में चिंतामण बायपास योजना का विरोध तेज: किसानों के साथ वैदिक गुरुकुल के बटुक भी उतरे सड़क पर !

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उज्जैन में रेलवे की प्रस्तावित चिंतामण बायपास योजना को लेकर विरोध लगातार तेज होता जा रहा है। शुक्रवार को मंगरोला रोड पर बड़ी संख्या में किसानों, ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने प्रदर्शन किया। इस विरोध प्रदर्शन में वैदिक गुरुकुल के बटुक भी शामिल हुए, जिन्होंने योजना को क्षेत्र की संस्कृति, शिक्षा और ग्रामीण जीवन के लिए खतरा बताया।

प्रदर्शन के दौरान किसानों और ग्रामीणों ने रेलवे विभाग के खिलाफ नारेबाजी करते हुए योजना को तत्काल निरस्त करने की मांग की। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि रेलवे विभाग पहले ही सर्वे और नक्शा प्रक्रिया पूरी कर चुका था, जिसमें किसानों की जमीनों का चिन्हांकन कर लिया गया था। इसके बावजूद अब दोबारा सर्वे के नाम पर खेतों और गांवों में खंभे लगाए जा रहे हैं और जमीनों का दोबारा सीमांकन किया जा रहा है।

ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन और रेलवे विभाग बिना किसानों की सहमति के जमीन अधिग्रहण की तैयारी कर रहे हैं। इससे क्षेत्र के किसानों में भारी नाराजगी है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि प्रस्तावित बायपास परियोजना से केवल खेती की जमीन ही प्रभावित नहीं होगी, बल्कि गांवों का सामाजिक और धार्मिक ढांचा भी बुरी तरह प्रभावित होगा।

किसानों के मुताबिक इस योजना की जद में मंगरोला सहित आसपास के कई गांव आ रहे हैं। अकेले मंगरोला गांव के करीब 38 किसान सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। ग्रामीणों का दावा है कि गांव की लगभग 40 से 50 बीघा उपजाऊ जमीन परियोजना के कारण प्रभावित हो सकती है।

प्रदर्शन कर रहे किसानों ने कहा कि जिन जमीनों पर वर्षों से खेती हो रही है, वही उनकी आजीविका का मुख्य साधन है। यदि भूमि अधिग्रहण हुआ तो कई परिवार आर्थिक संकट में आ जाएंगे। किसानों ने आरोप लगाया कि रेलवे विभाग उनकी समस्याओं को नजरअंदाज कर केवल परियोजना को आगे बढ़ाने में लगा हुआ है।

प्रदर्शनकारियों ने यह भी कहा कि प्रस्तावित बायपास मार्ग से क्षेत्र की कई महत्वपूर्ण संस्थाएं और संरचनाएं प्रभावित होंगी। इनमें स्कूल, वेद आश्रम, गांवों को जोड़ने वाली मुख्य सड़कें, बाग-बगीचे और स्थानीय व्यापारिक प्रतिष्ठान शामिल हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि योजना वर्तमान स्वरूप में लागू हुई तो पूरे क्षेत्र की व्यवस्था प्रभावित हो जाएगी।

किसानों ने रेलवे विभाग को वैकल्पिक सुझाव भी दिया है। उनका कहना है कि शिप्रा केबिन क्षेत्र की ओर से कम दूरी और कम लागत वाला अंडरपास मार्ग बनाया जा सकता है। इससे किसानों की जमीन बच जाएगी और परियोजना भी आसानी से पूरी हो सकेगी। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने यह सुझाव पहले भी प्रशासन और रेलवे अधिकारियों को दिया था, लेकिन अब तक उस पर कोई सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया।

प्रदर्शन में शामिल किसान नेताओं दीपक, जीत सिंह फौजी और सूर्यपाल सिंह ने बताया कि वे कई बार प्रशासन और रेलवे विभाग को ज्ञापन सौंप चुके हैं। इसके बावजूद उनकी समस्याओं और मांगों पर कोई गंभीर कार्रवाई नहीं हुई।

किसानों ने आरोप लगाया कि प्रशासन बिना संवाद किए केवल औपचारिक प्रक्रियाएं पूरी कर रहा है। इससे ग्रामीणों में असंतोष लगातार बढ़ रहा है। प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर जल्द विचार नहीं किया गया तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा।

इस विरोध प्रदर्शन की एक खास बात यह रही कि इसमें वैदिक गुरुकुल के छात्र यानी बटुक भी शामिल हुए। अखिल भारतीय नागदा अग्निहोत्री धर्मशाला में संचालित वैदिक गुरुकुल के संचालक आचार्य दीपक पाठक ने योजना का विरोध करते हुए कहा कि गुरुकुल परिसर भी इस परियोजना से प्रभावित हो सकता है।

उन्होंने बताया कि गुरुकुल में देश के अलग-अलग राज्यों से आए 25 से 50 बटुक वैदिक शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। यदि बायपास योजना वर्तमान प्रस्तावित मार्ग से लागू होती है तो गुरुकुल की शैक्षणिक और धार्मिक गतिविधियां प्रभावित होंगी। आचार्य दीपक पाठक ने कहा कि यह केवल जमीन का मामला नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और वैदिक परंपरा से जुड़ा मुद्दा भी है।

बटुकों ने भी हाथों में तख्तियां लेकर प्रदर्शन किया और परियोजना का विरोध जताया। उनका कहना था कि शिक्षा और संस्कृति को नुकसान पहुंचाकर विकास का कोई अर्थ नहीं है। प्रदर्शन के दौरान कई ग्रामीण महिलाओं ने भी हिस्सा लिया और अपनी जमीन बचाने की मांग की।

ग्रामीणों का कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास की योजनाएं ऐसी होनी चाहिए जिससे किसानों, ग्रामीणों और सांस्कृतिक संस्थाओं को नुकसान न पहुंचे। प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन से मांग की कि परियोजना के लिए वैकल्पिक मार्ग पर गंभीरता से विचार किया जाए।

उधर रेलवे विभाग की ओर से फिलहाल इस विरोध प्रदर्शन पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि स्थानीय प्रशासन स्थिति पर नजर बनाए हुए है। क्षेत्र में बढ़ते विरोध को देखते हुए आने वाले दिनों में प्रशासन और ग्रामीणों के बीच बातचीत की संभावना जताई जा रही है।

चिंतामण बायपास योजना को लेकर शुरू हुआ यह विवाद अब केवल जमीन अधिग्रहण का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह किसानों की आजीविका, ग्रामीण ढांचे और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा बड़ा आंदोलन बनता जा रहा है।

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