मध्यप्रदेश सहित देशभर में जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच बढ़ते टकराव और अभद्र व्यवहार की शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार ने कड़ा रुख अपनाया है। कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने राज्य के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि अधिकारियों को सांसदों और विधायकों के साथ व्यवहार संबंधी कर्तव्यों और दायित्वों का बोध कराया जाए।
यह पत्र हाल ही में भेजा गया है, जिसमें कहा गया है कि जनप्रतिनिधियों के साथ दुर्व्यवहार और प्रोटोकॉल का पालन न करने की लगातार मिल रही शिकायतें चिंताजनक हैं। केंद्र ने साफ कहा है कि ऐसी शिकायतें लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ठीक नहीं हैं और इन्हें गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
राजधानी भोपाल से मिली जानकारी के अनुसार, यह कोई पहला मामला नहीं है जब इस तरह के निर्देश जारी किए गए हैं। इससे पहले भी डीओपीटी और संसद की ओर से समय-समय पर मंत्रालयों और राज्यों को इस विषय में दिशा-निर्देश दिए जाते रहे हैं। 12 जनवरी 2026 को भी एक कार्यालय ज्ञापन के जरिए इन नियमों को दोहराया गया था और सभी स्तरों के अधिकारियों तक इन्हें पहुंचाने के निर्देश दिए गए थे।
खास बात यह है कि चार महीने के भीतर यह दूसरी बार है जब केंद्र सरकार ने इसी मुद्दे पर पत्र लिखा है। 4 मई को जारी इस पत्र में एक बार फिर सभी मंत्रालयों, विभागों और राज्यों के मुख्य सचिवों से कहा गया है कि वे अपने अधीनस्थ अधिकारियों को जनप्रतिनिधियों के साथ उचित व्यवहार और संवाद प्रक्रिया के बारे में जागरूक करें। साथ ही, इन निर्देशों के पालन की रिपोर्ट भी मांगी गई है।
केंद्र सरकार ने इस पत्र में जनप्रतिनिधियों के साथ संवाद और व्यवहार को लेकर कई महत्वपूर्ण प्रोटोकॉल तय किए हैं। इसमें कहा गया है कि सांसदों और विधायकों द्वारा भेजे गए पत्रों का समय पर जवाब देना अनिवार्य है और उसमें विनम्रता का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। यदि कोई पत्र मंत्री को संबोधित है, तो उसका उत्तर यथासंभव मंत्री द्वारा ही दिया जाना चाहिए। अन्य मामलों में जवाब सचिव स्तर के अधिकारी के हस्ताक्षर से ही भेजा जाना चाहिए।

इसके अलावा, यदि कोई पत्र किसी विभाग, सार्वजनिक उपक्रम या बैंक जैसे संस्थान को संबोधित है, तो संबंधित अधिकारी स्वयं उसका उत्तर दें। नीतिगत मामलों में उच्च अधिकारियों की स्वीकृति जरूरी होगी। साथ ही, यह भी निर्देश दिया गया है कि जनप्रतिनिधियों को मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए, जब तक कि वह गोपनीय या प्रतिबंधित श्रेणी में न आती हो।
पत्र में यह भी स्पष्ट किया गया है कि तय समयसीमा के भीतर जवाब देना जरूरी है। यदि किसी कारणवश अंतिम जवाब देने में देरी हो रही है, तो 15 दिनों के भीतर अंतरिम जवाब भेजकर स्थिति स्पष्ट करनी होगी। वहीं, यदि कोई पत्र गलती से किसी गलत विभाग को चला गया हो, तो उसे 5 कार्य दिवस के भीतर सही विभाग को भेजना अनिवार्य होगा।
केंद्र ने अधिकारियों को यह भी सलाह दी है कि वे पूर्व-टाइप किए गए सामान्य जवाबों से बचें और हर पत्र का उत्तर स्थिति के अनुसार दें। साथ ही, आम जनता के अनुरोधों को संवेदनशीलता और उपयोगकर्ता के दृष्टिकोण से देखने की बात भी कही गई है।
दरअसल, मध्यप्रदेश में यह मुद्दा लंबे समय से विवाद का कारण बना हुआ है। विधानसभा सत्र के दौरान अक्सर विधायक यह शिकायत करते हैं कि उन्हें उचित प्रोटोकॉल नहीं दिया जाता और उनके पत्रों का जवाब भी नहीं दिया जाता। हर बार सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से निर्देश जारी किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति में ज्यादा सुधार नहीं होता।
हाल के दिनों में जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच विवाद के कई मामले सामने आए हैं। राकेश सिंह पर आरोप लगे कि उन्होंने विधायकों की समस्याओं को नजरअंदाज किया। वहीं, जबलपुर में एक आईएएस अधिकारी के साथ कथित दुर्व्यवहार का मामला भी चर्चा में रहा।
इसके अलावा, प्रीतम लोधी द्वारा एक आईपीएस अधिकारी को धमकाने का मामला भी सामने आया, जिसमें बाद में उन्हें माफी मांगनी पड़ी। इसी तरह अलीराजपुर में मंत्री के परिजन द्वारा एक महिला अधिकारी को धमकी देने की घटना ने भी प्रशासनिक तंत्र पर सवाल खड़े किए।
इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच संवाद और व्यवहार को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देशों की जरूरत है। केंद्र सरकार का यह कदम उसी दिशा में एक प्रयास माना जा रहा है, ताकि दोनों पक्षों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो सके और प्रशासनिक कार्य सुचारू रूप से चल सके।
कुल मिलाकर, केंद्र सरकार का यह सख्त संदेश साफ करता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों का सम्मान और उनके साथ उचित व्यवहार सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। अब देखना होगा कि राज्य स्तर पर इन निर्देशों का कितना प्रभावी पालन होता है और क्या इससे लगातार उठ रहे विवादों पर रोक लग पाती है।