सागर: सागर जिला प्रदेश में एक अनूठी और नवाचार आधारित पहल के लिए चर्चा में है, जहां गौशालाओं में बिना मिट्टी के खेती यानी हाइड्रोपोनिक्स तकनीक के माध्यम से हरा चारा तैयार किया जा रहा है। यह मध्यप्रदेश का एकमात्र जिला है, जहां इस आधुनिक तकनीक को बड़े स्तर पर गौशालाओं में अपनाया गया है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य गौवंश को पौष्टिक आहार उपलब्ध कराना, गौशालाओं की आय बढ़ाना और ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना है।
जिले में इस तकनीक की शुरुआत 16 गौशालाओं में की गई है, जिनमें देवरी, केसली, रहली, शाहगढ़, बंडा, मालथौन, खुरई, राहतगढ़ और जैसीनगर ब्लॉकों की गौशालाएं शामिल हैं। इन गौशालाओं में रायखेरा, पटना खुर्द, रेगाझोली, बलेह, छिरारी, बरायठा, दलपतपुर, भेड़ाबमूरा, हड़ली, बरोदिया, बसारी, झिला, बासा और खामखुआं जैसे स्थानों पर हाइड्रोपोनिक्स इकाइयां स्थापित की गई हैं।
इस नवाचार के तहत कमरे के अंदर ट्रे में बीज अंकुरित किए जाते हैं और केवल पानी तथा आवश्यक पोषक तत्वों की सहायता से हरा चारा तैयार किया जाता है। इसमें मिट्टी का उपयोग बिल्कुल नहीं होता, जिससे यह तकनीक कम स्थान, कम समय और कम लागत में अधिक उत्पादन देने वाली साबित हो रही है। विशेषज्ञों के अनुसार एक किलो बीज से लगभग 7 किलो तक हरा चारा तैयार किया जा रहा है, जो पशुओं के लिए अत्यंत पौष्टिक और लाभकारी है।

इस योजना से न केवल गौवंश को बेहतर पोषण मिल रहा है, बल्कि गौशालाओं की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो रही है। तैयार किया गया हरा चारा लगभग 5 रुपये प्रति किलो की दर से उपयोग में लाया जा रहा है, जबकि इसकी लागत बहुत कम है। इस प्रकार कम निवेश में अधिक उत्पादन और आय प्राप्त हो रही है। अब तक जिले की 16 गौशालाओं में 26,880 किलोग्राम हरा चारा उत्पादन किया जा चुका है, जिससे लगभग 5,37,600 रुपये की आय अर्जित हुई है।
इस योजना ने गौशाला संचालन से जुड़ी महिलाओं के लिए भी रोजगार और आय के नए अवसर पैदा किए हैं। गौशालाओं में कार्यरत महिलाएं हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से चारा उत्पादन कर रही हैं, जिससे उनकी आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह पहल महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो रही है।
जिला कृषि विभाग के अधिकारी अनूप तिवारी के अनुसार, यह एक आधुनिक और वैज्ञानिक तकनीक है, जिसे जिले में सफलतापूर्वक लागू किया गया है। उन्होंने बताया कि हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से तैयार हरा चारा पशुओं के लिए अत्यंत पौष्टिक होता है, जिसमें कैल्शियम, प्रोटीन और अन्य आवश्यक पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। यह पारंपरिक चारे की तुलना में अधिक लाभकारी है।
हाइड्रोपोनिक्स तकनीक में केवल चारा ही नहीं, बल्कि विभिन्न प्रकार की पत्तेदार सब्जियां और हर्बल पौधे भी आसानी से उगाए जा सकते हैं। इनमें लेट्यूस, सलाद पत्ता, धनिया, पुदीना, तुलसी, टमाटर, हरी मिर्च और शिमला मिर्च जैसी फसलें शामिल हैं। यह तकनीक शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में कृषि उत्पादन के नए अवसर प्रदान कर रही है।
गौशालाओं में इस तकनीक के लागू होने से पशुओं के स्वास्थ्य में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है। नियमित रूप से पौष्टिक हरा चारा मिलने के कारण गौवंश की दूध उत्पादन क्षमता और स्वास्थ्य में सुधार हुआ है। इसके साथ ही कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रमों में साहीवाल और गिर जैसी उन्नत नस्लों के उपयोग से पशुधन की गुणवत्ता में भी वृद्धि हो रही है।
अधिकारियों का कहना है कि इस पहल से गौशालाएं अब केवल आश्रय स्थल नहीं रह गई हैं, बल्कि आत्मनिर्भर और उत्पादन केंद्रों के रूप में विकसित हो रही हैं। सस्ता और पौष्टिक चारा उपलब्ध होने से गौवंश की देखभाल बेहतर तरीके से हो रही है और पशुपालकों को भी इसका प्रत्यक्ष लाभ मिल रहा है।
इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता इसका कम जल उपयोग और सीमित स्थान में अधिक उत्पादन क्षमता है। यह जल संरक्षण और सतत कृषि विकास की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। भविष्य में इस मॉडल को और अधिक गौशालाओं में विस्तार देने की योजना है।
सागर जिले की यह पहल न केवल पशुपालन क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला रही है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, महिला स्वावलंबन और कृषि नवाचार के क्षेत्र में भी एक प्रेरणादायक उदाहरण बनकर उभरी है।