नई दिल्ली/इंदौर। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 8 दिसंबर को किसानों के लिए नई आर्थिक मदद का ऐलान करते हुए भारत से आयातित चावल पर टैरिफ बढ़ाने की बात कही। ट्रम्प का कहना है कि भारत, वियतनाम और थाईलैंड जैसे देशों से सस्ता चावल अमेरिका में पहुंच रहा है, जिससे अमेरिकी किसानों को नुकसान हो रहा है। उन्होंने इसे ‘डंपिंग’ करार दिया और कहा कि भारत को इसके लिए टैरिफ देना होगा।
हालांकि, भारतीय और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि यह आरोप निराधार है। भारत का बासमती चावल अमेरिकी चावल की तुलना में बेहतर क्वालिटी का है और वहां इसकी डिमांड लगातार बढ़ रही है। इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (IREF) के मुताबिक, 2025 में भारत ने अमेरिका को 28.3 हजार करोड़ रुपए का बासमती और करीब 5 हजार करोड़ रुपए का गैर-बासमती चावल निर्यात किया।


अप्रैल 2025 में अमेरिका ने भारतीय चावल पर रेसिप्रोकल टैरिफ लागू किया, जिससे पहले 10% कस्टम ड्यूटी 25% तक बढ़ी। अगस्त में रूस से तेल आयात के कारण 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाने के बाद भारत के चावल पर कुल 50% टैरिफ लागू हो गया।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत का चावल अमेरिकी उत्पादन का मात्र 2% से कम है और टैरिफ बढ़ने से भारतीय किसानों को नुकसान नहीं होगा। अमेरिका में भारतीय चावल की मांग बनी रहेगी, जबकि दुनिया के अन्य देशों में भी भारत के बासमती और नॉन-बासमती चावल की मजबूत मांग है।

इतिहास से जुड़ी बात करें तो 1960 के दशक में भारत को अमेरिका से PL-480 स्कीम के तहत लाल गेहूं मिलता था, जिसकी क्वालिटी खराब थी। उस दौर के संकट और हरित क्रांति के प्रयासों के बाद भारत ने चावल की पैदावार बढ़ाई और वैश्विक बाजार में अपनी पकड़ मजबूत की। आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक बन चुका है, वैश्विक निर्यात में लगभग 40% हिस्सेदारी के साथ।
विशेषज्ञों की राय:
डॉ. प्रेम गर्ग, IREF के अध्यक्ष, कहते हैं, “भारतीय चावल पर टैरिफ बढ़ाने से अमेरिकी किसानों को कोई फायदा नहीं होगा, बल्कि अमेरिकी उपभोक्ता महंगा चावल खरीदेंगे। भारत की क्वालिटी और GI टैग वाले बासमती की मांग बनी रहेगी।”
भारत का कहना है कि अमेरिकी टैरिफ नीति से निर्यात प्रभावित हो सकता है, लेकिन वैश्विक बाजार में भारत की चावल की डिमांड को देखते हुए यह असर सीमित होगा।