Indore में तेजी से बढ़ रही सेल्फ ड्राइव कार सेवा अब वाहन मालिकों के लिए चिंता का कारण बनती जा रही है। मोबाइल एप आधारित कार रेंटल प्लेटफॉर्म पर अपनी निजी गाड़ियां अटैच करने वाले कई लोग अब कानूनी और आर्थिक परेशानियों में फंस रहे हैं। शहर में वर्तमान में पांच से अधिक ऐसे एप सक्रिय हैं, जिनसे एक हजार से ज्यादा निजी वाहन जुड़े बताए जा रहे हैं।
इन प्लेटफॉर्म्स का उपयोग करने वाले कार मालिक अतिरिक्त कमाई की उम्मीद में अपनी गाड़ियां किराये पर उपलब्ध कराते हैं, लेकिन हाल के महीनों में सामने आए मामलों ने इस व्यवस्था की सुरक्षा और कानूनी वैधता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कई मामलों में किराये पर ली गई कारों का इस्तेमाल शराब तस्करी, अवैध गतिविधियों और दुर्घटनाओं में हुआ, जबकि पुलिस केस वाहन मालिकों के नाम पर दर्ज हो गए।

निजी गाड़ियां बन रहीं किराये का साधन
सेल्फ ड्राइव कार एप्स जैसे Zoomcar और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर लोग अपनी निजी कारें ऑनलाइन अटैच कर देते हैं। ग्राहक मोबाइल एप के माध्यम से कुछ घंटों या दिनों के लिए वाहन बुक करते हैं और स्वयं चलाते हैं।
इन कंपनियों का दावा होता है कि वे केवल वाहन मालिक और ग्राहक के बीच डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका निभाती हैं। वाहन का उपयोग “निजी इस्तेमाल” के रूप में दिखाया जाता है। लेकिन हकीकत में ये गाड़ियां व्यावसायिक उपयोग में आ रही हैं, जबकि अधिकांश के पास कमर्शियल परमिट नहीं होता।
रिपोर्टर ने बुक की निजी नंबर प्लेट वाली कार
20 अप्रैल 2026 को इंदौर में एक रिपोर्टर ने जूमकार एप के जरिए एक स्विफ्ट डिजायर कार बुक की। जांच में सामने आया कि कार पूरी तरह निजी रजिस्ट्रेशन की थी। वाहन पर न पीली नंबर प्लेट थी, न ब्लैक नंबर प्लेट और न ही कमर्शियल परमिट मौजूद था।
कार मालिक महेश उधाणी ने बताया कि वे रोजाना कार का इस्तेमाल नहीं करते, इसलिए अतिरिक्त आय के लिए उसे प्लेटफॉर्म पर डाल दिया। यह स्थिति दर्शाती है कि बड़ी संख्या में निजी वाहन बिना व्यावसायिक अनुमति के किराये पर चलाए जा रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार मोटर व्हीकल नियमों के तहत निजी रजिस्ट्रेशन वाली गाड़ियों का व्यावसायिक उपयोग प्रतिबंधित है। इसके बावजूद ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के जरिए यह काम खुलेआम जारी है।
अपराधों में हो रहा इस्तेमाल
सबसे गंभीर चिंता का विषय यह है कि इन किराये की गाड़ियों का इस्तेमाल अपराधों में भी होने लगा है। पुलिस रिकॉर्ड में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां सेल्फ ड्राइव एप से ली गई कारों का उपयोग शराब तस्करी, अवैध परिवहन और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों में किया गया।
ऐसे मामलों में सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि वाहन के दस्तावेज मूल मालिक के नाम पर होते हैं। पुलिस कार्रवाई के दौरान सबसे पहले वाहन मालिक ही जांच के दायरे में आते हैं। कई बार उन्हें यह साबित करने में महीनों लग जाते हैं कि घटना के समय वाहन किसी अन्य व्यक्ति के पास था।
बिहार में शराब तस्करी में पकड़ी गई कार
नोएडा निवासी इंजीनियर Sonu Yadav का मामला इस समस्या का बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया। उनकी कार सितंबर 2025 में बिहार में शराब तस्करी के मामले में पकड़ी गई। बताया गया कि वाहन सेल्फ ड्राइव प्लेटफॉर्म पर अटैच था और किसी ग्राहक ने उसे बुक किया था।
कार पकड़े जाने के बाद पुलिस रिकॉर्ड में वाहन मालिक का नाम आने से सोनू यादव को भारी कानूनी परेशानियों का सामना करना पड़ा। उन्हें वाहन छुड़ाने के लिए कर्ज लेना पड़ा और यहां तक कि Patna High Court से अग्रिम जमानत भी करानी पड़ी।
इस घटना ने देशभर में उन लोगों को चिंता में डाल दिया है जो अपनी निजी गाड़ियां इन एप्स से जोड़कर कमाई कर रहे हैं।
एक्सीडेंट के बाद महीनों गैराज में रही कार
इंदौर निवासी सुरेंद्र सिंह नाहर ने भी इसी तरह की परेशानी साझा की। उन्होंने बताया कि उनकी कार एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से जुड़ी हुई थी। बुकिंग के दौरान वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो गया और बाद में छह महीने तक गोधरा के एक गैराज में खड़ा रहा।
उन्होंने आरोप लगाया कि कंपनी की ओर से समय पर सहायता नहीं मिली। गाड़ी लंबे समय तक खराब हालत में रही, जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान हुआ। वाहन बीमा और जिम्मेदारी को लेकर भी उन्हें कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
ईओडब्ल्यू ने जारी किया नोटिस
मामले की गंभीरता को देखते हुए Economic Offences Wing ने भी जांच शुरू कर दी है। ईओडब्ल्यू के डीएसपी Pankaj Gautam ने बताया कि शिकायत मिलने के बाद संबंधित कंपनी को नोटिस जारी किया गया है।
उन्होंने कहा कि कंपनी से यह जानकारी मांगी गई है कि निजी रजिस्ट्रेशन वाली गाड़ियों को किस आधार पर किराये पर चलाया जा रहा है और सुरक्षा व सत्यापन की क्या प्रक्रिया अपनाई जा रही है। हालांकि अब तक कंपनी की ओर से कोई जवाब नहीं मिला है।
ईओडब्ल्यू ने परिवहन विभाग से भी जानकारी मांगी है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि इन गाड़ियों के संचालन में मोटर व्हीकल नियमों का उल्लंघन तो नहीं हो रहा।
कंपनी की चुप्पी पर उठे सवाल
इस पूरे मामले में जब मीडिया ने Zoomcar का पक्ष जानने की कोशिश की, तो कंपनी की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कंपनियां केवल डिजिटल प्लेटफॉर्म होने का दावा करती हैं, तब भी उनकी जिम्मेदारी बनती है कि वे वाहन और ग्राहकों का कड़ा सत्यापन करें। साथ ही यह सुनिश्चित करें कि वाहन कानूनी रूप से व्यावसायिक उपयोग के योग्य हों।
बीमा और कानूनी जिम्मेदारी का संकट
ऐसे मामलों में सबसे बड़ा विवाद बीमा और कानूनी जिम्मेदारी को लेकर खड़ा होता है। निजी बीमा पॉलिसी वाली गाड़ी यदि किराये पर उपयोग होती है और दुर्घटना हो जाती है, तो कई बार बीमा कंपनियां क्लेम देने से इनकार कर देती हैं।
इसके अलावा यदि वाहन अपराध में इस्तेमाल हो जाए, तो पुलिस और अदालत की प्रक्रिया में वाहन मालिक को ही बार-बार उपस्थित होना पड़ता है। इससे मानसिक तनाव, आर्थिक नुकसान और सामाजिक बदनामी जैसी समस्याएं पैदा होती हैं।
विशेषज्ञों ने मांगी सख्त नीति
परिवहन विशेषज्ञों और कानूनी जानकारों का कहना है कि सरकार को इस क्षेत्र के लिए स्पष्ट नियम बनाने चाहिए।
उनका मानना है कि:
- केवल कमर्शियल परमिट वाली गाड़ियों को ही ऐसे प्लेटफॉर्म पर अनुमति दी जाए।
- ग्राहकों का पुलिस सत्यापन अनिवार्य किया जाए।
- कंपनियों को कानूनी जिम्मेदारी तय करने के लिए बाध्य किया जाए।
- अपराध में इस्तेमाल होने पर वाहन मालिक को स्वतः आरोपी न माना जाए।
- जीपीएस डेटा और बुकिंग रिकॉर्ड तुरंत पुलिस को उपलब्ध कराए जाएं।
तेजी से बढ़ रहा कारोबार
शहरों में युवाओं और यात्रियों के बीच सेल्फ ड्राइव कारों की मांग तेजी से बढ़ रही है। लोग बिना ड्राइवर के सुविधा और कम लागत के कारण इन सेवाओं का उपयोग कर रहे हैं। लेकिन जिस तेजी से यह कारोबार बढ़ा है, उसी अनुपात में नियम और निगरानी व्यवस्था विकसित नहीं हो पाई है।
इंदौर में सक्रिय पांच से अधिक प्लेटफॉर्म और हजारों गाड़ियों का संचालन यह दिखाता है कि यह उद्योग तेजी से फैल रहा है। यदि समय रहते स्पष्ट नीति और कड़ी निगरानी नहीं की गई, तो आने वाले समय में ऐसे विवाद और अपराध बढ़ सकते हैं।
फिलहाल ईओडब्ल्यू और परिवहन विभाग की जांच जारी है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि प्रशासन इन कंपनियों और वाहन मालिकों की जिम्मेदारी तय करने के लिए क्या कदम उठाता है।