निलंबित पंचायत सचिव की बहाली पर बवाल: महिला सरपंच पहुंचीं हाईकोर्ट, वित्तीय अनियमितता के आरोपी सचिव की पुनः पदस्थापना पर उठे सवाल !

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खजुराहो।
राजनगर जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत कोटा में निलंबित पंचायत सचिव की पुनः पदस्थापना को लेकर विवाद गहरा गया है। वित्तीय अनियमितताओं और शासकीय राशि के दुरुपयोग के आरोपों में निलंबित किए गए पंचायत सचिव हरिओम सिंह को उसी पंचायत में दोबारा पदस्थ किए जाने के बाद ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों और पंचायत प्रशासन के बीच असंतोष बढ़ गया है। मामले ने अब कानूनी रूप ले लिया है और ग्राम पंचायत की महिला सरपंच सावित्री राठौर ने इस निर्णय को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है।

जानकारी के अनुसार ग्राम पंचायत कोटा में पदस्थ सचिव हरिओम सिंह के खिलाफ वित्तीय गड़बड़ी और पंचायत निधियों के दुरुपयोग संबंधी शिकायतें सामने आई थीं। शिकायतों के बाद जिला पंचायत स्तर पर प्रारंभिक जांच कराई गई, जिसमें आरोप प्रथम दृष्टया सही पाए गए। इसके आधार पर जिला पंचायत कार्यालय द्वारा पत्र क्रमांक 150 के माध्यम से 10 फरवरी 2026 को सचिव हरिओम सिंह को निलंबित कर दिया गया था।

धारा 92 के तहत शुरू हुई थी कार्रवाई

निलंबन के बाद पंचायत राज अधिनियम के तहत उनके खिलाफ विधिवत कार्रवाई भी प्रारंभ की गई। मध्यप्रदेश पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम, 1993 की धारा 92 के अंतर्गत प्रकरण दर्ज कर जांच आगे बढ़ाई गई। इसके साथ ही मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत छतरपुर द्वारा 24 मार्च 2026 को प्रकरण क्रमांक 85/धारा 40-92/2025-26 के तहत कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था।

जांच लंबित रहने के दौरान पंचायत कार्य प्रभावित न हों, इसके लिए समीपस्थ पंचायत के सचिव अजय तिवारी को ग्राम पंचायत कोटा का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया था। पंचायत का प्रशासनिक कार्य इसी व्यवस्था के तहत संचालित किया जा रहा था।

तीन महीने बाद फिर उसी पंचायत में पदस्थ

विवाद उस समय और गहरा गया जब लगभग तीन माह बाद जिला पंचायत के आदेश पर हरिओम सिंह को पुनः उसी ग्राम पंचायत कोटा में पदस्थ कर दिया गया। इस फैसले के बाद ग्रामीणों और पंचायत प्रतिनिधियों में नाराजगी फैल गई।

ग्राम पंचायत की सरपंच सावित्री राठौर ने इस निर्णय पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जिस अधिकारी पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे हों और जिसकी जांच अभी पूरी भी नहीं हुई हो, उसे उसी पंचायत में वापस भेजना प्रशासनिक पारदर्शिता और निष्पक्ष जांच प्रक्रिया के विपरीत है।

हाईकोर्ट में दायर की याचिका

महिला सरपंच सावित्री राठौर ने सचिव की पुनः पदस्थापना के खिलाफ उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। उन्होंने आरोप लगाया है कि सचिव की वापसी से पंचायत के दस्तावेजों में हस्तक्षेप और जांच को प्रभावित करने की आशंका बढ़ गई है।

सरपंच का कहना है कि यदि जांच निष्पक्ष रूप से करानी है, तो संबंधित अधिकारी को उसी स्थान पर दोबारा पदस्थ नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि पंचायत के कई महत्वपूर्ण वित्तीय दस्तावेज सचिव के नियंत्रण में रहते हैं, ऐसे में जांच प्रभावित होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

छह वर्षों से एक ही पंचायत में पदस्थ

मामले का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह भी सामने आया है कि हरिओम सिंह पिछले लगभग छह वर्षों से ग्राम पंचायत कोटा में ही पदस्थ बताए जा रहे हैं। इसे लेकर भी प्रशासनिक व्यवस्था और स्थानांतरण नीति पर सवाल उठने लगे हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि लंबे समय तक एक ही पंचायत में पदस्थ रहने से जवाबदेही और पारदर्शिता प्रभावित होती है। कई लोगों ने प्रशासन से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है।

ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों में नाराजगी

ग्राम पंचायत कोटा के कई ग्रामीणों ने भी सचिव की पुनः नियुक्ति पर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि जब किसी अधिकारी पर गंभीर आरोप लगे हों और जांच जारी हो, तब तक उसे दूरस्थ स्थान पर पदस्थ किया जाना चाहिए था।

ग्रामीणों का आरोप है कि इस फैसले से पंचायत में अविश्वास और असंतोष का माहौल बन गया है। वहीं पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि यदि इस प्रकार के मामलों में सख्ती नहीं बरती गई, तो पंचायत स्तर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का संदेश कमजोर होगा।

प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी निगाहें

अब इस पूरे मामले में सभी की नजरें उच्च न्यायालय की सुनवाई और जिला प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर टिकी हुई हैं। यह मामला केवल एक पंचायत सचिव की पुनः पदस्थापना तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पंचायत प्रशासन में पारदर्शिता, जवाबदेही और वित्तीय अनुशासन जैसे बड़े सवाल भी खड़े कर रहा है।

यदि न्यायालय इस मामले में हस्तक्षेप करता है, तो पंचायत प्रशासन से जुड़े मामलों में भविष्य की कार्रवाई और नियुक्ति प्रक्रियाओं पर भी इसका असर पड़ सकता है।

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